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पञ्चाङ्ग- 29 मार्च 2026

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis


*🎈दिनांक 29 मार्च 2026*
*🎈 वार- शुक्रवार*
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈 मास - चैत्र मास*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष,*
*🎈तिथि-     द्वितीया    26:30:23*
तिथि    तृतीया *
*🎈 नक्षत्र -    रेवती    26:26:55** तक    तत्पश्चात्     अश्विनी    👇
*🎈 योग    -         ब्रह्म    22:13:55* तक तत्पश्चात् इंद्र*
*🎈करण    -     बालव    15:43:15* तक तत्पश्चात् कौलव*
*🎈राहुकाल -11:12 am से  12:43am(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
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*🎈 चन्द्र राशि-     मेष*
*🎈सूर्य राशि-       मीन*
*🎈 सूर्योदय -   06:40:26*
*🎈सूर्यास्त -        18:44:52*pm* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*

*🎈दिशा शूल- पूर्व दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 05:03 ए एम से 05:51 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:18 पी एम से 01:07 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:18 ए एम, मार्च 22 से 01:06 ए एम, मार्च 22*
*🎈  अमृत काल    -05:58 पी एम से 07:27 पी एम*
*🎈 रवि योग    -12:37 ए एम, मार्च 22 से 06:37 ए एम, मार्च 22*
*🎈 व्रत एवं पर्व द्वितीया व्रत
       शुक्रवार*
*🎈विशेष चैत्र मास महात्म्य *
 🙏 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🙏
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💥सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💥मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💥सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💥धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
💥रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
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नागौर, राजस्थान, (भारत)    
   मानक सूर्योदय के अनुसार।*
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    *🛟चोघडिया, दिन का🛟

day

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        *🛟चोघडिया, रात्🛟*
night

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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
                   नवरात्रि के 9 दिन…
                     माँ के 9 रूप…
और हर दिन के लिए एक दिव्य मंत्र। 🕉️🌺

नवरात्रि का दूसरा दिन है माँ ब्रह्मचारिणी का और यह दिन जुड़ा है मंगल ग्रह से। मंगल देता है ऊर्जा ,साहस और शक्ति
लेकिन जब मंगल असंतुलित हो जाए तो यही ऊर्जा बन जाती है :
❌ गुस्सा
❌ रिश्तों में टकराव
❌ मंगल दोष
माँ ब्रह्मचारिणी ने कठोर तपस्या से अपनी ऊर्जा को साधा था। इसलिए उनकी पूजा से उग्र मंगल शांत और सात्विक बन सकता है। नवरात्रि के दूसरे दिन करे यह ज्योतिषीय उपाय:
🌹 माँ को लाल गुलाब या लाल फूल अर्पित करें
🤍 मंगल की उग्रता संतुलित करने के लिए और 108 बार जाप करें ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः 🙏✨
🌿✨  #*🕉️ #🌺#🎉💕💢💥💤💤
 🔱  नवरात्रि के 9 दिन का २ रा दिन 🕉️🌺

जीवंत सद्गुरु को  किए गए प्रणाम से व्यक्ति परमात्मा तक पहुंच सकता है।

प्रणाम यानी भाव की अभिव्यक्ति। हमें लगता है जब हम प्रणाम की मुद्रा में आते हैं तो हम सामनेवाली व्यक्ति को प्रणाम कर रहे हैं। लेकिन वहीं हम गलत हो जाते हैं; हम उसमें बसी आत्मचेतना को प्रणाम कर रहे होते हैं, जो असल में परमात्मा का अंश है और वो ही अंश प्रणाम करनेवाले में विद्यमान होता है। यानी हम अपने आप को ही भावांजलि दे रहे होते हैं। क्योंकि दिख रहा और अदृश्य दोनों ही एकमेव परमात्मा का ही विस्तार है। अद्वैत परमात्मा की लीला यानी सृष्टि। अप्रयोजन, अकारण बस मात्र अद्वैत का अनेकों में सृजन यानी सृष्टि और हमारा अहंकार रूपी अलगाव हमारी अकारण अधिक सोच से वैचारिक प्रदूषण की दीवार यानी व्यक्ति। अहंकार और वैचारिक दीवार टूटने के बाद जो प्रगट होता है वो है शक्ति। आत्मा को अहंकार की परत यानी नर और परतें हटाकर अद्वैत महासागर में विलीनीकरण यानी "नारायण"। इसी अहंकार की परत को उतारने का शस्त्र यानी प्रणाम।

हम प्रणाम के माध्यम से अपने में पड़े अहंकार को ही भाव के माध्यम से समर्पित करते हैं। व्यक्ति का व्यक्ति को प्रणाम यानी शक्ति को प्रेम-वंदना। व्यक्ति का सद्‌गुरु को प्रणाम यानी अहंकार का समर्पण। व्यक्ति का परमात्मा को प्रणाम यानी व्यक्ति की चेतना का चैतन्य-सागर में विलीनीकरण। प्रणाम किसी को भी करो प्रणाम का परिणाम तो आशीर्वाद ही होता है। जीवंत सद्‌गुरु को किया हुआ प्रणाम हमारे अहंकार के निर्मूलन का रास्ता है। सद्‌गुरु स्वयं ही भाव और समर्पण से अपने आप को झुकाकर अहंशून्यता को प्राप्त हुआ होता है। यानी हमारा समर्पित किया हुआ अहंकार सद्‌गुरु के माध्यम से सागर में विलीन होता रहता है। क्योंकि सद्‌गुरु परमात्मा और आत्मा के बीच की संधि होता है।

 पैर छूकर किए गए प्रणाम का परिणाम आशीर्वाद होता है। हमारा उनको झुकना उन लोगों को आत्मिक स्तर पे ले जाता है और आत्मा सदैव प्रेम, शांति, क्षमा, करुणा, सत्य, दान आदि सद्‌गुणों से भरी होती है। उनको झुककर हम उनके प्रेम को जीतने का माध्यम बन जाते हैं। एक ओर हमारा अहंकार कम होता है तो दूसरी ओर आत्मा के सद्गुणों का हमारी झुकी हुई आत्मा पर संक्रमण होता है। यानी हमें दोनों ओर से प्राप्ति ही प्राप्ति होती है। अकारण आशीर्वाद से हम तो तरोताजा ही हो जाते हैं। एक तो हमारा अहंकार का स्तर कम होता है और दूसरा हम पर सद्‌गुणों का संक्रमण होता है। यानी हमारा जहर कम होता है और अमृत की अधिकता होती जाती है। प्रणाम भारतीय संस्कृति की अद्भुत खोज है। 

दूसरा, दो हाथों से किया गया प्रणाम यानी हमारी सूर्यनाड़ी और चंद्रनाड़ी में बहता प्रवाह मध्यनाड़ी में आ जाता है। एक चुंबकीय फील्ड दोनों हाथों को जोड़ने से बनता है। एक सकारात्मक और गुणग्राहक माहौल बनता है। ऐसे माहौल में दो हाथों को जोड़ने पर हमारी आँखें बंद हो जाती हैं। क्षणभर के लिए हम हमारे में बसे आत्मा रूपी परमात्मा तक पहुँच जाते हैं। यानी प्रणाम का परिणाम होता है परमात्मा का साक्षात्कार। दो हाथों को जोड़ना आखिर में हमें हमारे अंदर ही ले जाता है।

प्रथम दृष्टि से हमें लगता है कि हम दूसरे को आदर दे रहे हैं मगर जरा ध्यान से देखा जाए तो हम हमारी आत्मा को ही सशक्त कर रहे होते हैं। हम अपने आप को ही झुक रहे होते हैं। क्योंकि यहाँ कोई एक ही नहीं है तो दूसरा कैसे होगा? कोई दो नहीं हैं। परमात्मा अद्वैत है। दूसरा दिख रहा है ये बस संसार है, एक भास है मगर इसके पीछे तो बस 'वो' ही है। जो प्रणाम करनेवाले में है वो ही सामनेवाले में है।

पंचांग प्रणाम दो हाथ, दो पैर और मस्तिष्क को झुकाकर किया गया प्रणाम। ज्यादातर ऐसा प्रणाम हम जीवंत सदगुरु, समाधि स्थानों पर करते हैं। ये प्रणाम बड़ा हीप्रामाणिक  है। ये प्रणाम हमारे अहंकार रूपी जहर को तो रिक्त  करता ही है और साथ में ये हमारी गुरु चेतना  शून्य की स्थिति उसका भी क्षण भर का अनुभव, क्षण भर की अनुभूति प्रदान करता है। थोड़ी ही क्षणों के लिए मगर हमें चेतना  की याद आती है। हमारा भटकाव याद आता है। अपने घर जाने की याद आती है। आत्मा की प्रार्थना और परमात्मा को दिए गए वादे याद आते हैं। बड़ा ही सूचक और अंतर्मुखी करती एक शारीरिक और आत्मिक स्थिति है ये। 

 बस एक यही कारण है। परमात्मा से और करीबी परम के प्रति समर्पण का भाव  से या इस प्रणाम से प्रदर्शित होता है। 

साष्टांग प्रणाम या दंडवत् यानी भूमि पर संपूर्ण झुककर इस प्रकार का प्रणाम होता है। ज्यादातर इस प्रकार से सद्‌गुरु,  भाव अभिव्यक्त किया जाता है। यानी संपूर्ण रूप से परम को समर्पण। सभी अंग, पूरा शरीर, अहंकार, अलगाव सब तुमको समर्पित। 'तेरा तुझ को अर्पण' वाला भाव इस प्रणाम का परिणाम है! और धरती का गुण है कि नकारात्मकता ले लेगी और सकारात्मकता स्थापित कर देगी। यानी व्यक्ति का अहंकार और अलगाव तो नष्ट होता ही है, साथ में धरती की क्षमा, उदारता, सहनशीलता का संक्रमण इस प्रणाम करनेवाले में हो जाता है। व्यक्ति क्षण भर को शबवत्  हो जाता है। एक क्षण के लिए भी व्यक्ति को महासागर में लीन होने की अनुभूति प्राप्त हो जाती है। जीवन की क्षणभंगुरता और झुकने से प्राप्त होता है परमात्मा। झुकने से नष्ट होता है अहंकार। ये सब आत्मज्ञान एकमात्र प्रणाम के माध्यम से व्यक्ति पा लेता है। परमात्मा का ही व्याप उसे समझ में आ जाता है। मगर झुकाव भाव से होना आवश्यक है। झुकना निरपेक्ष होना आवश्यक है। झुकना सहज होना आवश्यक है। दंडवत् से व्यक्ति का शक्ति के प्रति संपूर्ण समर्पण भाव प्रगट होता है। व्यक्ति को अकेला होने का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। धरती से जुड़ने का परिणाम प्राप्त हो जाता है।

प्रणाम प्रथम तो अपने आप को ही होता है। लगता है हम दूसरे को झुक रहे हैं, ऐसा लगता है हम झुक रहे हैं मगर होते हैं हम ऊर्ध्वगामी। यानी क्रम में हम आत्मा को और बाद में परमात्मा को ही झुकते हैं। असल में हम है ही परमात्मा का व्याप। हम अपने आप को ही झुकते रहते हैं क्योंकि अहंकार से हम व्यक्ति है; अहंनिर्मूलन के बाद हम उस अद्वैत का ही व्याप है। प्रणाम से इसकी प्रतीति हमें होती है। सामान्य सा दिखनेवाला प्रणाम अगर भाव के साथ घटित होता है तो सबसे बड़े रूपांतरण का कारण बन सकता है। व्यक्ति संपूर्ण महासागर में रूपांतरित हो सकता है। ये संपूर्ण वैज्ञानिक मार्ग है जो अपनाया जाए तो इस प्रयोग के माध्यम से बिंदु सिंधु बन सकता है।

प्रणाम भारत में अपने आप को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। हम किसको क्या मानते है, हमारे जीवन मे किसका क्या स्थान है, प्रणाम उस स्थान को प्रदर्शित करता है। आज पूरी दुनिया ने मान लिया है कि भारत की अभिवादन पद्धति सर्वाधिक वैज्ञानिक है। स्पर्श प्रेम को प्रदर्शित करने का प्रतीक तो है ही, लेकिन स्पर्श से हम एक दूसरे से सूक्ष्म जीवाणु का आदान-प्रदान कर सकते है और एक दूसरे की ऊर्जा का अनायास ही आदान-प्रदान करने से बचने के लिए भारत ने प्रणाम जैसी सर्वोत्तम अभिवादन करने की पद्धति का आविष्कार किया। प्रणाम संपूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है।

प्रणाम के विभिन्न प्रकार भी भारत में आविष्कृत हुए है। जो व्यक्ति की भीतर की स्थिति एवं सामने वाले का क्या स्थान है उसका प्रतिनिधित्व करते है। दंडवत प्रणाम का अर्थ है, की व्यक्ति ने अपने आप को अस्तित्व के हवाले कर दिया है। इस प्रणाम में व्यक्ति दंडवत हो जाता है यानि कि अपने अहंकार का मृत्यु हो गया है, इसे साष्टांग प्रणाम भी कहते है। जब व्यक्ति पैर छूता है तब अपना अहंकार अनुभवी के चरणों में समर्पित करता है। जब व्यक्ति पंचांग प्रणाम करता है इसका अर्थ है की जीवन का संपूर्ण समर्पण कर दिया है। व्यक्ति गर्भावस्था को उपलब्ध हो गया है। व्यक्ति जब हाथ जोड़ कर प्रणाम करता है, तो इसका अर्थ है, की व्यक्ति ने अपने भीतर रहे परमात्मा के अंश को अभिवादन किया है। यानि हर एक मुद्रा के पीछे गहन विज्ञान और मनोविज्ञान भरा पड़ा है।

"आप सभी में स्थित सदगुरुदेव को प्रणाम "
.     💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥

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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
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vipul

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