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पञ्चाङ्ग - 10 फरवरी 2026

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

JYOTISH


*🎈दिनांक - 10 फरवरी 2026*
*🎈 दिन-  मंगलवार*
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शरद*
*🎈 मास - फाल्गुन मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष*
*🎈तिथि-     अष्टमी    07:26:39 तक तत्पश्चात नवमी*
*🎈 नक्षत्र -    विशाखा    31:54:20* तक तत्पश्चात्         अनुराधा👇
*🎈 योग    -     ध्रुव    25:41:17* तक तत्पश्चात् व्याघात*
*🎈करण    -     कौलव    07:26:39* तक तत्पश्चात्  तैतुल*
*🎈राहुकाल -04:59 पी एम से 06:22 पी एम(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
*🎈चन्द्र राशि-     वृश्चिक*
*🎈सूर्य राशि-     मकर    *
*🎈 सूर्योदय-07:16:56am*
*🎈सूर्यास्त -        18:21:57*  pm* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पूर्व दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 05:33 ए एम से 06:24 ए एम(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:27 पी एम से 01:12 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:23 ए एम, फरवरी 10 से 01:15 ए एम, फरवरी 10*
 *🎈 अमृत काल    -11:12 पी एम से 12:59 ए एम, फरवरी 11*
 
*🎈 व्रत एवं पर्व- ...अष्टमी*
*🎈विशेष फाल्गुन मास महात्म्य *
 🙏 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🙏
kundli



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    *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
   नागौर, राजस्थान, (भारत)    
   मानक सूर्योदय के अनुसार।*
day

🛟

    
        *🛟चोघडिया, रात्🛟*
night

*🛟 
 


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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🌷❤️💐🌼🪔❤️💐👉 ✍️ ★√*🛡️🌹

🌿✨  #*गजमुक्ता हाथी के मस्तक से प्राप्त एक प्रकार का मोती है।

इस प्रकार मोती के लिए संस्कृत भाषा में एक प्रसिद्ध श्लोक है :—

शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
साधवो नहि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ॥

— चाणक्यनीति १.९॥

प्रत्येक पर्वत में माणिक्य नहीं मिलते, न ही सभी हाथियों में मोती; साधु सर्वत्र नहीं मिलते न ही चन्दन सभी वनों में मिलता है।

वाचस्पत्यम् के अनुसार गजमुक्ता हाथी के कुम्भ से प्राप्त मोती है। किरात गजमुक्ता का व्यापार करते हैं। मल्लिनाथ के अनुसार हाथी (करीन्द्र), बादल (जीमूत), शूकर (वराह), शंख (शङ्ख), मछली (मत्स्या), सर्प (अहि), सीपियों (शुक्ति), बाँस (वेणु, वंश) इन आठ से मोतियों का उद्भव कहा जाता है।

गजमुक्ता — स्त्री गजे तत्कुम्भे जाता मुक्ता। हस्तिकुम्भजाते मुक्ताभेदे “मुक्ताफलैः किशरिणां किराता” कुमा० व्या० मल्लिनाथधृतवाक्यम् “करीन्द्रजामूतवराहशङ्खमत्स्याहिशुक्त्युद्भववेणुजानि। मुक्ताफलानि प्रथितानि लोके देवां तु शुक्त्युद्भवमेव भूरि” मुक्तैव स्वार्थे क ठञ्। गजमौक्ति कमप्यत्र। “गजमौक्तिकावलियुतेन वक्षसा” किरा० मल्लिनाथतद्व्या० करिणां मुक्तायोनित्वे प्रमाणमाहागस्त्यः “जीमूतकरिमत्स्याहिवंशशङ्खवराहजाः। शुक्त्युद्भवाश्चविज्ञेया अष्टौ मौक्तिकयोनयः”।— वाचस्पत्यम्

गजमुक्ता के बारे में यह कहा जाता है कि :—

जब गजमुक्ता के चारों ओर "पान का पत्ता" लपेटा जाता है, तो थोड़ी देर के बाद पत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े ऐसे लगते हैं मानो काँटे चुभाए गए हों।
गजमुक्ता को अगर साफ पानी में डाल दिया जाए तो पानी दूधिया हो जाता है।
स्टेथोस्कोप से परीक्षण करने पर, गजमुक्ता की धड़कन सुनी जा सकती है; अगर गजमुक्ता को हाथ में लिया जाए तो थोड़ा कंपन महसूस किया जा सकता है।
नारियल पानी में रखने पर उसमें बुलबुले बनते हैं और अंत में पानी की मात्रा कम हो जाती है।
यदि गजमुक्ता को "पान के पत्ते" पर रखा जाता है, अथवा राई में रखा जाता है, तो गजमुक्ता में कम्पन होने लगता है।
गजमुक्ता के कई चिकित्सीय लाभ हैं और इसमें जोड़ों के दर्द, पुरुषों और महिलाओं दोनों में बच्चा पैदा करने में असमर्थता जैसी कई बीमारियों को ठीक करने की क्षमता है। यह आध्यात्मिक उपचार में मदद करता है और तनाव से राहत देता है। यह सौभाग्यवर्धक भी माना जाता है।
गजमुक्ता के बारे में यह प्रचलित है कि लाखों हाथियों में से एक में ही यह मोती मिलते हैं।
भारतीय साहित्य के अनुसार, एक ऐसे हाथी को 125 साल तक जीवित रहना चाहिए था, क्योंकि ऐसे परिपक्व हाथी के दाँत में "गजमुक्ता/गजमोती" बनने में 75 से 80 वर्ष लग जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि ऐसा हाथी "ऐरावत" की प्रजाति का होना चाहिए।
Tulsi

गजमुकुता हीरामनि चौक पुराइय हो।
देइ सुअरघ राम कहँ लेइ बैठाइय हो।।
कनकखंभ चहुँ ओर मध्य सिंहासन हो।
मानिकदीप बराय बैठि तेहि आसन हो ।।४।।

… … …

काने कनक तरीवन, बेसरि सोहइ हो।
गजमुकुता कर हार कंठमनि मोहइ हो।।
कर कंचन, कटि किंकिन, नूपुर बाजइ हो।
रानी कै दीन्हीं सारी तौ अधिक बिराजइ हो ।।११।। — रामलला नहछू / तुलसीदास

पहली बात यदि गजमुक्ता हाथियों से मिलती है और लाखों में एक ही हाथी में पाई जाती है तो वर्तमान में हाथियों की सङ्ख्या के आँकड़े देखते हैं; प्रजाति के अनुसार हाथियों की कुल सङ्ख्या यह है :—

अफ्रीकी झाड़ियों के हाथी (African bush elephant, लोक्सोडोंटा अफ्रीका — (Loxodonta africana) — 3,52,000
अफ्रीकी वन हाथी (African forest elephant, लोक्सोडोंटा साइक्लोटी — (Loxodonta cycloti)1,40,000
भारतीय हाथी (Elephas maximus indicus) — 27,312
श्रीलङ्काई हाथी (Elephas maximus maximus) — 7,000
सुमात्राई हाथी (Elephas maximus sumatranus) — 2,400–2,800
बोर्नियोई हाथी (Elephas maximus borneensis) — 1,000–1,600
अतः सभी हाथियों की सङ्ख्या लगभग सवा पाँच लाख है। गजमुक्ता के बारे में जो कहा जाता है उसके अनुसार तो लगभग पाँच ही हाथियों में गजमणि होगी। अर्थात, यह विश्व की सबसे मूल्यवान वस्तुओं में होनी चाहिए।

किन्तु यह मात्र 1090 रूपये प्रति गजमुक्ता के भी उपलब्ध है। [1]

गजमुक्ता के एक वितरक का कहना है :—

हम गज मणि प्राप्त करने के लिए हाथियों को नहीं मारते। हम किसी भी जानवर की हत्या के दृढ विरोधी हैं। ये सभी जीवाश्म हैं और हजारों वर्ष पुराने हैं जो केवल विशेषज्ञ शमन, तांत्रिक, अथवा उच्च आध्यात्मिक शक्ति वाले व्यक्ति द्वारा खोजे जाते हैं।

पच्चीस ग्राम भार की यह गज मणि 1,589.00 में उपलब्ध थी। 
वहीं अन्यत्र गजमुक्ता का यह रूप (155.000 gm) उपलब्ध है।

इस चित्र के साथ दिए आलेख में लिखा है कि गजमुक्ता का अपना चुम्बकीय क्षेत्र होता है। अण्डे जैसा दिखने वाला मादा हाथी का मोती है और दूसरा नर हाथी का मोती है। इसके साथ दिए विवरण में यह भी लिखा है कि यह गजमुक्ता उन्हें एक साधु ने दी जिसे यह एक अन्य साधु से मिलीं। अतः इस बात का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं कि यह वास्तव में गजमुक्ता ही हैं। उन्होंने यह भी लिखा है कि साठ से सत्तर हाथियों में गजमुक्ता मिलते हैं। जो इसकी दुर्लभता का आकलन बहुत कम कर देता है।

वहीं श्रीलङ्का में छह गजमुक्ता का मूल्य पन्द्रह लाख रूपये बताया गया है; जिसका मूल्य भारतीय रुपयों में लगभग पचास हजार प्रति गजमुक्ता है।
किन्तु, जैसा आप आगे पढ़ेंगे कि यह वास्तव में मोती न होकर कुछ और हैं।

 "दन्तवल्कल (डेंटाइन) की सङ्केन्द्रित परतों में कभी-कभी किसी बाह्य वस्तु के आने से दन्तवल्कल की परत उसके आसपास जमा हो जाती हैं, जो हाथी के दाँत की मांसल गुहा में प्रवेश कर जाती है, इससे मोती जैसा कम अथवा अधिक गोलाकार मनका बनता है। जिन्हें श्रीलङ्का में "गजमुत्तु" के रूप में जाना जाता है।

श्रीलंका में वर्तमान स्थिति के अनुसार ऐसे हाथी या तो हैं ही नहीं अथवा अत्यन्त दुर्लभ हैं। इसलिए वर्तमान श्रीलंकाई हाथियों में "गजमुत्तु" बनने की सम्भावना लगभग 0.001% से भीकम है। यह उल्लेख करना उल्लेखनीय है कि "गजमुत्तु" की कहानियाँ केवल श्रीलंका और भारत के कुछ क्षेत्रों में मौजूद हैं। अन्य एशियाई देशों में, जैसे म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया आदि, जहाँ मानव और हाथी सद्भाव में रहते हैं और अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों में एक दूसरे के बहुत निकट हैं। लेकिन "गजमुत्तु" का कोई उल्लेख इन संस्कृतियों में नहीं हैं और न ही अफ्रीकी देशों में जहां बड़े पैमाने पर हाथियों का अवैध शिकार होता रहता है और एक बड़ी सङ्ख्या में हाथी अब भी रहते हैं। [3]

यह जान लेना आवश्यक है कि गजमुक्ता को भले ही मोतियों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है; किन्तु वास्तव में यह मोती नहीं होता। संडे ऑब्जर्वर की रिपोर्ट में एशियन एलिफेंट स्पेशलिस्ट ग्रुप के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर डॉ. नन्दना अटापट्टू अटापट्टू का कहना है कि हाथी दाँत के शीर्ष एक तिहाई भाग के भीतर, नसों, रक्त वाहिकाओं और ऊतकों से भरी एक गुहा होती है, इसमें जेल के समान प्रतीत होता एक मांसल पदार्थ रहता है। यह जेल दाँत के आधार पर शंक्वाकार आकार के क्षेत्र में रहता है, जो दन्तवल्कल (डेंटाइन) से ढका होता है। डॉ. अटापट्टू के अनुसार आयु बढ़ने के साथ यह जैल कम होता जाता है और जब हाथी 60 साल की अवस्था तक पहुँचता है तो भाग खोखला हो जाता है; और इसकी जेल धीरे-धीरे सूखकर ठोस पिण्डों का स्वरूप लेने लगता है।

यह पिण्ड जेल के सूखने के साथ अलग हो जाते हैं; और हाथी के अपना सिर हिलाने से इन पिण्डों में चमक आने लगती है और यह गोलाकार होने लगते हैं। सरल भाषा में; गजमुक्ता हाथी के दाँत का ही एक भाग है; जो बूढ़े हाथियों में मिलता है। डॉ. अटापट्टू कहते हैं कि एक गजमुक्ता चावल अथवा दाल के दाने से अधिक बड़ा नहीं होता है। एक प्राकृतिक गजमुक्ता निश्चित रूप से मानव के पैर के छोटे नाखून से बड़ा नहीं हो सकता है। मीडिया में आलू या अण्डे के आकार के हाथी के मोतियों की छवियों को छापा, जो हाथी के दाँत के साथ जब्त किए गए थे। उनके अनुसार ये बनावटी हैं और कृत्रिम रूप से दाँतों या किसी अन्य हड्डी से बनाए गए हैं।

हाथी के दाँत के मांसल विदर (pulp cavity - चित्र में काले रङ्ग से दर्शायी) की मज्जा हाथी की आयु के साथ सूखने लगती है; एवं इस खोखले भाग में गजमुक्ता बनते हैं।

अतः गजमुक्ता के रूप में हम जो देखते हैं वह कुछ और भी हो सकता है। वास्तविक गजमुक्ता का लगभग इतना ही बड़ा होने की सम्भावना है।

अतः गजमुक्ता के बारे में जो विश्वास से कहा जा सकता है वह यह कि गजमुक्ता होते हैं; किन्तु, यह हमारे पैरों की चिट्टी अंगुली के नाखून से अधिक बड़े नहीं होते। यह नर हाथी के बाह्य दाँतों के भीतरी मांसल भाग के आयु के साथ सूख जाने से बनते हैं; और हाथी के सर हिलाने से पड़ी रगड़ से यह चिकने और चमकदार होने लगते हैं। बाह्य दाँतों हाथियों की लुप्त प्रजातियों के जीवाश्मों में भी कुछ में गजमुक्ता मिल सकते हैं।
किन्तु, बाजार में उपलब्ध गजमुक्ता कहे जाने वाले मोतियों से सावधान रहें; यह कृत्रिम विधि से बनाये हुए भी हो सकते हैं। यह भी सम्भव है कि इन्हें पाने के लिए हाथियों का संहार किया गया हो।

जहाँ तक कि गजमुक्ता से भाग्य जागने की बात है; उस भाग्य के लिए पुरुषार्थ की भी आवश्यकता होती है।

नोट 🚫 गजमुक्ता के छायां चित्र केवल पाठकों की जानकारी के लिए है।

🙏🧡

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.     💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥

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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
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