*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक 30 नवंबर 2025 *
*🎈 दिन - रविवार"
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शरद*
*🎈 मास - मार्गशीर्ष*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈तिथि- दशमी 21:28:40*am तत्पश्चात् एकादशी*
*🎈 नक्षत्र - उत्तरभाद्रपदा 25:10:01* pmतत्पश्चात् उत्तरभाद्रपदा*
*🎈 योग - वज्र 07:11:24*am तक तत्पश्चात्
*🎈 योग- सिद्वि 28:21:04*
*🎈करण - तैतुल 10:27:09am तत्पश्चात् गर*
*🎈 पंचक ४अहोरात्र-अशुभ*
*🎈 राहुकाल -हर जगह का अलग है- 04:20pm to 05:39pm तक (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈चन्द्र राशि- मीन *
*🎈सूर्य राशि- वृश्चिक*
*🎈सूर्योदय - 07:08:02am*
*🎈सूर्यास्त -17:39:25pm*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल - पश्चिम दिशा में*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 05:19 ए एम से 06:13:00( ए एम प्रातः तक *(नागौर
राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:45 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 11:57 पी एम से 12:51 ए एम, नवम्बर०१*
*🎈 सर्वार्थ सिद्धि योग -07:07 ए एम से 01:11 ए एम, दिसम्बर 01*
*🎈 रवि- 07:07 ए एम से 01:11 ए एम, दिसम्बर१*
*🎈 व्रत एवं पर्व- दशमी व्रत*
*🎈विशेष - मार्गशीर्ष महात्म्य*
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*🛟चोघडिया, दिन🛟*
नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।
*🛟चोघडिया, रात्🛟*
🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
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💐 * #योग_साधना_और_भोग💐
शरीर के प्रति दो दृष्टियां हैं वे दो दृष्टियां हैं--भोग दृष्टि और त्याग दृष्टि। जो इन दोनों से ऊपर उठ जाता है अर्थात्--न भोग और न त्याग। वही साधक सफल होता है। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, जो भी महत्वपूर्ण है और जो भी उपलब्ध करने योग्य है, उसका मार्ग शरीर के भीतर है। जो उस मार्ग से भली भांति परिचित है, वही जीवन धारा को नाभि केंद्र तक ले जा सकने में समर्थ है। ध्यान, प्रेम और शान्ति साधना के सम्बन्ध में बहुत- सी ऐसी बातें हैं जिनसे बहुत ही कम लोग परिचित हैं। पहले मस्तिष्क को ही ले लें--यह पहला केंद्र है। मस्तिष्क हर वक्त तनावग्रस्त रहता है यहाँ तक कि निद्रा-काल में भी। मनुष्य पूरे दिन जो भी कार्य करता है, वही कार्य वह निद्रा-काल में भी करता है। पूरे दिन का प्रतिविम्ब रात्री है। दिन भर मानस पटल पर विचारों की, भावों की, कार्यों की और अनुभवों की जो छाया बराबर पड़ती रहती है, उसी की प्रतिध्वनि अथवा प्रतिच्छाया निद्रा-काल में बराबर उभरती रहती है। मनुष्य का जो काम दिन में पूरा नहीं हुआ रहता है, उसे मन निद्रा-काल में पूरा करने का प्रयास करता है। दिनभर व्रत-उपवास रखने वाला व्यक्ति निद्रा-काल में स्वप्न में भोजन करता है। दिन के अभाव की पूर्ति इस प्रकार निद्रा-काल में हो जाती है। नारी-सुख से वंचित मनुष्य स्वप्नावस्था में नारी-सुख प्राप्त कर अपने को संतुष्ट कर लेता है। जाग्रत अवस्था में जिस वस्तु का अभाव रहता है, उस अभाव की पूर्ति स्वप्नावस्था में स्वयं हो जाती है।
अब ह्रदय को लीजिये। मस्तिष्क की तरह वह भी हर समय तनावग्रस्त रहता है। हर समय वह घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि से भरा रहता है। प्रेम क्या है, स्नेह क्या है, दया क्या है, करुणा क्या है ?--इन सबको एक प्रकार से मनुष्य जानता ही नहीं। उनसे विपरीत जो कुछ भी है, उनसे वह परिचित है। हृदय एक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र है। उसमें एक ही काल में और एक ही अवस्था में एक ही वस्तु रह सकती है, दूसरी नहीं। या तो प्रेम रहेगा या घृणा रहेगी। लेकिन मनुष्य अपने एक ही ह्रदय में दोनों काम करता है। कभी प्रेम करता है वह तो कभी घृणा। वह भलीभांति न प्रेम से परिचित है और न तो पूर्णरूप से घृणा से ही। यदि पूर्णरूप से वह प्रेम से परिचित होता तो उसके हृदय में कभी घृणा उत्पन्न नहीं हो सकती। प्रेमपूर्ण हृदय में घृणा का भाव कभी रह ही नहीं सकता। जरा सोचने की बात है ऐसा क्या कोई हृदय है जो प्रेम भी करे और घृणा भी। सच्चा हृदय बस एक को जानता है--प्रेम को या फिर घृणा को। यदि वह दोनों को जानता है तो वह हृदय नहीं है, पशु है। पशु के पास हृदय नहीं होता। हृदय का वास्तविक गुण है--प्रेम। प्रेम के वृक्ष पर ही दया, कृपा, करुणा, प्रेम, स्नेह आदि के सुगन्धित फूल खिलते हैं समय-समय पर।
जिसको मनुष्य प्रेम समझता है, वह वास्तव में प्रेम नहीं होता। सच तो यह है कि मनुष्य के हृदय में प्रेम नाम की वस्तु है ही नहीं। घृणा के भाव का कम हो जाने को ही वह प्रेम समझता है। आज कल जो प्रेम दृष्टिगोचर होता है, वह प्रेम नहीं, वासना है। सच्चे प्रेम में वासना, कामना, स्वार्थ की भावना लेशमात्र भी नहीं रहती। प्रेम कुछ पाना नहीं चाहता, सदा देना ही चाहता है। प्रेम में हमेशा दूसरे का ध्यान रहता है, स्वयं का नहीं। ऐसे प्रेमपूर्ण ह्रदय में घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष रह ही नहीं सकते।
प्रेम के बाद है आनन्द। मनुष्य ने अपने जीवन में क्या कभी आनन्द का अनुभव किया ? यह कहना कठिन है कि किसी ने प्रेम और आनन्द का कभी अनुभव किया है और कभी किया है शान्ति का अनुभव ? मनुष्य अब तक जिसको जानता-समझता आया है, वह है अशान्ति। अशान्ति की मात्रा जब कभी जीवन में कम हो जाती है, उसे ही वह शान्ति समझ लेता है। लेकिन वह वास्तविक शान्ति है ही नहीं। इसी प्रकार वह घृणा को जानता है, प्रेम को नहीं। वह ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध को जानता है, प्रेम, करुणा, दया और शान्ति को नहीं। एक परम योगी का हृदय ऐसा ही होता है--स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण और उनकी सुगंधों से भरा-भरा।
मस्तिष्क और ह्रदय तनाव से मुक्त कैसे हो ?एकमात्र ध्यान से ही मस्तिष्क और हृदय तनावमुक्त रह सकते हैं। जैसे-जैसे ध्यान गहन से गहनतम होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे दोनों केंद्रों के तनावों से मुक्त होता जायेगा। मस्तिष्क और हृदय दोनों स्वच्छ और निर्मल होते जायेंगे। अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जायेगी जब व्यक्ति का मस्तिष्क और हृदय एक परमयोगी का मस्तिष्क और हृदय बन जायेगा।
नाभि का विकास आवश्यक नाभि सबसे महत्वपूर्ण है और इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिशु नाभि से जन्म लेता है और इसलिए कि जीवन का जो परम सत्य है, उसमें प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग नाभि ही है। जीवन के वास्तविक सत्य से परिचित होने के लिए एकमात्र साधन नाभि को ही बतलाया गया है।
मनुष्य दिनभर फेफड़े से श्वास लेता है लेकिन रात्रि में सोने के बाद वह श्वास लेता है नाभि से। जरा यह समझने की बात है। दिन में फेफड़े से श्वास लेने के कारण मनुष्य की छाती सिकुड़ती-फैलती है। जबकि निद्रावस्था में नाभि से श्वास लेने के कारण पेट फूलता-पिचकता है। कहने के लिए तो हम हमेशा यही कहते-समझते हैं कि मनुष्य फेफड़े से ही सदैव श्वास लेता है पर कुछ बातें मनुष्य के अधिकार में नहीं होतीं। मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर साधारण मनुष्य का अधिकार नहीं होता। फेफड़े दिन-रात कार्य करते हैं, मस्तिष्क दिन-रात कार्य करता है, उसका हृदय दिन-रात कार्य करता है, उसका पाचन-तंत्र और आंतें दिन-रात कार्य करती हैं और इसी तरह उसकी नाभि भी दिन-रात कार्य करती रहती है। मनुष्य के मस्तिष्क का अधिकार उसके हाथ, पैर, नेत्र, जीभ, मुख, कान आदि इन्द्रियों पर तो है, पर कुछ वस्तुएं उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। वह जब चाहे नेत्र बंद कर सकता है, जब चाहे , नेत्र खोल सकता है। वह जब चाहे हाथ-पैर आगे बढ़ा सकता और जब चाहे पीछे को उल्टा चल सकता है। लेकिन मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर मनुष्य का अधिकार नहीं है। उन पर अधिकार है प्रकृति का। तो जब मनुष्य रात्रि को निद्रा में बेहोश होता है, उस समय उसका श्वास प्रकृति की संचालन शक्ति (आत्मचेतना) चलाती है जिसका माध्यम होती है--नाभि।
बच्चा अपने जन्म से लेकर पांच वर्ष की आयुपर्यन्त नाभि से ही श्वास लेता है। पांच वर्ष के बाद उसके श्वास की गति धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठने लग जाती है और उसी के अनुसार उसकी नाभि का कम्पन कम होने लगता है और फेफड़े का कम्पन बढ़ने लगता है। प्रकृति के कार्य में त्रुटि नहीं होती है। जब तक शिशु प्रकृति के अधीन है और वह नाभि से श्वास लेता है तब तक उसके श्वास के लेने की प्रक्रिया सही रहती है। लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य जब बड़ा होने लगता है तो नाभि का प्रयोग घटता जाता है और फेफड़े का प्रयोग बढ़ता जाता है और इसीलिए यदि देखा जाय तो मनुष्य आलसवश ठीक से श्वास फेफड़ों में नहीं भरता है। उसकी स्वाभाविक श्वास छोटी होती है। श्वास के द्वारा हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) अपने भीतर खींचते हैं जिससे मनुष्य का जीवन चलता है। शरीर, उसकी असंख्य धमनियाँ, अरबों-खरबों कोशिकाएं ऑक्सीजन के द्वारा शुद्ध होकर अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहती हैं। लेकिन मनुष्य है कि वह ठीक से श्वास भी नहीं लेता। आधा-अधूरा श्वास भरता है वह फेफड़ों में जिसका परिणाम यह होता है कि पहले तो प्राणवायु पूरे फेफड़ों में नीचे तक नहीं पहुँच पाता और फेफड़े अस्वस्थ होकर रुग्ण रहने लगते हैं। फेफड़े रूग्ण होने पर वे हृदय द्वारा अशुद्ध रक्त को ठीक से साफ नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि मनुष्य के शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होते जानेे से वह सदैव रूग्ण रहने लगता है। शरीर में शुद्ध रक्त-संचालन होता रहे, सारे अंगों में, धमनियों में, कोशिकाओं में शुद्ध रक्त पहुँचता रहे--इसके लिए आवश्यक है सहज श्वास, दीर्घ श्वास। हमारे योगियों ने, ऋषियों ने इसीलिए प्राणायाम का महत्व बतलाया है।
नाभि का कम्पन नाभि का कम्पन उस समय बढ़ जाता है जिस समय मनुष्य भयभीत होता है, अचानक डर जाता है, अचानक कोई संकट सामने आ जाता है, अचानक मृत्यु की आशंका उपस्थिति हो जाती है, किसी दुर्घटना का आभास लग जाता है। उस समय सबसे पहले नाभि के स्थान पर 'धक्' की ध्वनि के साथ कम्पन बढ़ जाता है। मनुष्य के डर का, भय का, वासना का स्थान नाभि ही है। अतः नाभि के कम्पन बढ़ जाने से हृदय का भी संचालन तेज होने लगता है। दिल धक्- धक् कर तेज-तेज धड़कने लगता है और उसी के साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी प्रभावित हो जाता है। कभी-कभी तो मस्तिष्क का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। यदि वह इस समय किसी वाहन को चला रहा है तो दुर्घटना की आशंका बढ़ जायेगी। इसके कारण के पीछे है नाभि का अधिक कम्पन।जैसे मस्तिष्क और हृदय को स्वच्छ, निर्मल और विकसित करने के लिए ध्यान आवश्यक है, इसी प्रकार नाभि को विकसित करने के लिए और उसके द्वारा अधिक से अधिक आत्मचेतना ग्रहण करने के लिए भी साधन है और वह साधन है सभी प्रकार के भय से मुक्ति अर्थात् अभय की साधना। मनुष्य जितनी अभय की साधना करेगा, उतना ही वह भय से मुक्त होता जायेगा, और उतनी ही उसकी नाभि विकसित होती जायेगी। जितनी उसकी नाभि विकसित होगी, उतना ही वह गहराई में प्रवेश करता जायेगा और उतना ही वह आत्मचेतना को भी होगा उपलब्ध।
💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी संबद्ध विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेवें...*
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱









