दीपावली श्री लक्ष्मी गणेश पूजन का विशेष अंक
🌷 शुभ दीपावली 🌷
लक्की प्राइम न्यूज़ एवं रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश प्रेमजी, नागौर (राजस्थान)
की सभी को दीपोत्सव महापर्व की राम-राम एवं हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏
🙏ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद। मम गृहे आगच्छ आगच्छ। श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं स्वर्णवर्षिण्यै लक्ष्म्यै मम गृहे आगच्छ आगच्छ। ह्रीं ह्रीं ह्रीं नमः॥
नमो नारायणी। 🙏
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🌷 दीपावली के पावन दीप मंत्र 🌷
१.दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं सन्ध्यादीप नमोऽस्तु ते॥
अर्थ— दीप की ज्योति ही परम ब्रह्म है और वही भगवान जनार्दन विष्णु का स्वरूप है। हे संध्याकालीन दीप! आप मेरे समस्त पापों एवं अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करें। आपको मेरा नमन है।
२.शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदः।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
अर्थ— दीपज्योति शुभता, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा प्रदान करती है तथा शत्रुता एवं बुरी बुद्धि का विनाश करती है। ऐसी मंगलमयी दीपज्योति को मेरा नमन है।
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✨ दीपावली शुभकामना संदेश ✨
१ 🌸 दीपों की पंक्तियाँ कहें — अंधकार मिटे जग से, हर हृदय में प्रेम जले, लक्ष्मी आएँ घर-आँगन में!
२.🌸 अंधकार से उजाले की ओर, दुःख से सुख की ओर — यही दीपावली का संदेश है!
💫 माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु आपके जीवन में अपार सुख, शान्ति और सौभाग्य भर दें!
३.🪔 दीपों की रोशनी से झिलमिलाए संसार, आपके जीवन में आए खुशियों की बहार!
━━━━━━━━━━━━━━━━━━🌹 माँ महालक्ष्मी से विनती 🌹
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
मैं मूर्ख बालक अज्ञानी, तुम हो अम्बे अन्तर्यामी। पाप, क्रोध, अपराध क्षमा कर, उज्ज्वल कर दे भाग्य-सितारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
दुःख-दरिद्रता ने हृदय जलाए, निर्धनता ने मन बिलखाए। पग-पग ठोकर खाऊँ अम्बे, नैन बहाएँ अश्रुधारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
विनय सुनो हे विष्णुमाया, दे कमलासिनी अपनी छाया। धन-जन से परिपूर्ण करो माँ, द्वार पे खड़ा है दास तुम्हारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
दया करो, सुख-सम्पत्ति साजो, गणपति, शारदे संग विराजो। ऋद्धि-सिद्धि मेरे संग समाकर, अपने से लगा ले हृदय हमारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
मन्दबुद्धि हूँ, भाग्यविधाता, ज्ञान की कुंजी दो, सुखदाता। राह न कोई हमें दिखाए, मार्गदर्शक बनो हमारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
इतना करम इस दास पर कर दे, धन-जन, सुख-सम्पत्ति भर दे। जन्म-जन्म का दास बना ले, बस यही मिले वरदान तुम्हारा॥
चहुँ दिशा हर मोड़ ने मारा, दो लक्ष्मी माँ, हमें सहारा॥
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🌷स्वर्णलक्ष्मी स्तव🌷
हरिः ॐ तत्सत्।
श्रीगुरुदेवाय नमः।
श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः॥
पाठ से पहले ध्यान एवं प्रार्थना करें
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं स्वर्णमालिनि लक्ष्मीपतये नारायणाय नमः।
ॐ स्वर्णलक्ष्मीसंयुक्ताय स्वर्णेश्वरविष्णवे नमः॥
🌷 स्वर्णेश्वर विष्णु-सह-स्वर्णलक्ष्मी ध्यान एवं प्रार्थना स्तोत्रम् 🌷
🪷 ध्यानम्
स्वर्णवर्णौ दिव्यरूपौ स्वर्णकमलासने स्थितौ।
स्वर्णिमामृतसिन्धौ तौ तेजोमण्डलमध्यगौ॥ शङ्खचक्रगदापद्मधारिणं नारायणं प्रभुम्।
अमृतकलशहस्तां तां लक्ष्मीं सौम्यामुपास्महे॥
चारुभासितवक्त्राभ्यां चन्द्रकोटिसमप्रभौ।
स्वर्णेश्वरं सह लक्ष्म्या ध्याने चेतसि स्थापयेत्॥
हिन्दी भावार्थ—
मैं उन दिव्य स्वरूपधारी, स्वर्णवर्ण श्रीहरि स्वर्णेश्वर नारायण और श्रीमती स्वर्णलक्ष्मी का ध्यान करता हूँ, जो स्वर्णकमल पर विराजमान हैं तथा स्वर्णिम अमृतसागर के मध्य तेजोमय प्रकाशपुंज में स्थित हैं।
स्वर्णेश्वर नारायण के हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल सुशोभित हैं। वे प्रभु दिव्य तेज से दीप्तिमान हैं।
स्वर्णलक्ष्मी देवी के हाथों में अमृत से भरा कलश है। वे सौम्यता और करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं।
उन दोनों के मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओं के समान मनोहर एवं प्रकाशमान हैं।
मैं अपने चित्त में स्वर्णलक्ष्मी सहित स्वर्णेश्वर नारायण को श्रद्धापूर्वक स्थापित करता हूँ।
🪷 प्रार्थना
🍁 १.स्वर्णसिन्धुसमुत्पन्नं स्वर्णवर्णं सुरोत्तमम्।
स्वर्णकमलसंस्थं च स्वर्णमालाविभूषितम्॥
अर्थ— जो स्वर्णिम सागर से प्रकट हुए हैं, स्वर्ण के समान कान्तिमान हैं, स्वर्णकमल पर विराजमान हैं तथा स्वर्णमालाओं से सुशोभित हैं, उन दिव्य स्वरूप का मैं ध्यान करता हूँ।
🍁 २.
शङ्खचक्रगदापद्मधारिणं देवतापतिम्।
स्वर्णेश्वरं विष्णुं वन्दे सह लक्ष्म्या विराजितम्॥
अर्थ— शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले, देवताओं के स्वामी, स्वर्णलक्ष्मी के साथ विराजमान भगवान विष्णु के स्वर्णेश्वर स्वरूप को मैं नमन करता हूँ।
🍁 ३.अमृतकलशहस्तां तां स्वर्णलक्ष्मीं मनोरमाम्।
हरिप्रियां मनोहारिणीं चन्द्रकोटिसमप्रभाम्॥
अर्थ— अमृतकलश धारण करने वाली, मनोहर स्वरूपवाली, हरिप्रिया स्वर्णलक्ष्मी, जिनकी दिव्य आभा करोड़ों चन्द्रमाओं के समान है, उन देवी को मैं वन्दन करता हूँ।
🍁 ४.चारुहासवदनां देवीं करुणारसपूरिताम्।
ध्यायामि तां महाशक्तिं विष्णोः सहचरीं शुभाम्॥
अर्थ— सुन्दर मुस्कान से सुशोभित, करुणा के रस से परिपूर्ण, भगवान विष्णु की नित्य सहचरी उस शुभ एवं महाशक्तिस्वरूपा देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
🍁 ५.स्वर्णद्वीपविहारिण्याः स्वर्णकाञ्चनभूषितम्।
श्रीहरिं सह लक्ष्म्याऽहं पूजयामि समाहितः॥
अर्थ— स्वर्णद्वीप में विहार करने वाली स्वर्णलक्ष्मी के साथ विराजमान, स्वर्णाभूषणों से सुशोभित श्रीहरि का मैं एकाग्रचित्त होकर पूजन करता हूँ।
🍁 ६.यत्र लक्ष्मीः स्थिता नित्यं विष्णुपत्नी प्रियम्वदा।
तत्र स्वर्णप्रभा शोभा विलसत्येव सर्वदा॥
अर्थ— जहाँ भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी लक्ष्मीजी नित्य विराजमान रहती हैं, वहाँ स्वर्णिम प्रभा और दिव्य शोभा सदैव प्रकाशित होती रहती है।
🍁 ७.स्वर्णसिंहासनस्थं च स्वर्णछत्रविभूषितम्।
स्वर्णमुक्ताफलैः कीर्णं तं देवं चिन्तये सदा॥
अर्थ— स्वर्णसिंहासन पर विराजमान, स्वर्णछत्र से सुशोभित तथा स्वर्ण एवं मुक्तामणियों से अलंकृत उस परमदेव का मैं सदा चिन्तन करता हूँ।
🍁 ८.स्वर्णपद्मासना देवी स्वर्णालङ्कारभूषिता।
स्वर्णेश्वरं विष्णुं च हृदि ध्यायन्ति योगिनः॥
अर्थ— स्वर्णकमल पर विराजमान, स्वर्णाभूषणों से अलंकृत देवी लक्ष्मी तथा स्वर्णेश्वर भगवान विष्णु का योगीजन अपने हृदय में ध्यान करते हैं।
🍁 ९.यत्रैव हरिलक्ष्मी च स्वर्णतेजोविभूषितौ।
तत्रैव सिद्धयः सर्वाः सम्पदश्च प्रवर्तन्ते॥
अर्थ— जहाँ भगवान हरि और लक्ष्मीजी स्वर्णिम तेज से सुशोभित होकर विराजमान रहते हैं, वहाँ समस्त सिद्धियाँ और सम्पदाएँ स्वयं प्रकट होती हैं।
🍁 १०.इदं स्तोत्रं समुच्चार्य स्वर्णध्यानपरायणः।
लभते स्वर्णसम्पत्तिं भुक्तिं मुक्तिं च मानवः॥
अर्थ— जो मनुष्य इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है तथा स्वर्णेश्वर नारायण और स्वर्णलक्ष्मी के ध्यान में लीन रहता है, वह उनकी कृपा से ऐश्वर्य, सुख-सम्पत्ति तथा परम कल्याण प्राप्त करता है।
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🌷 लक्ष्मी अमृतवाणी भजन (१) 🌷
विश्वप्रिया कमलेश्वरी, लक्ष्मी दयानिधान।
तिमिर हरो अज्ञान का, ज्ञान का दो वरदान॥
आठों सिद्धियाँ द्वार तेरे, खड़ी हैं माँ कर जोड़।
निज भक्तों की नाव को, तट की ओर तू मोड़॥
निर्धन हम लाचार बड़े, तू है धन का कोष।
सुख की वर्षा करके माँ, हर लो दुःख-संताप दोष॥
(जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता,
जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।)
जीवन-चन्दा को मैया, ग्रहण लगा घनघोर।
डगमग डोले पग हमारे, हम मानव कमजोर॥
महासुखदायी नाम तेरा, कर कष्टों का अन्त।
वनस्थली जैसी ये काया, दे दो इसे बसन्त॥
दिव्यरूप नारायणी, पारस है तेरा धाम।
तेरे सुमिरन से होते, संतों के सिद्ध काज॥
(जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।)
स्वर्ण-सी तेरी कांति, भय का करती नाश।
तेरी करुणा से टूटे, हर जंजाल का पाश॥
मैया शोकविनाशिनी, ऐसा करो उपकार।
जीवन-नौका हो जाए, भवसागर से पार॥
शेष की शय्या पर बैठकर, सकल विश्व को देख।
तेरी दृष्टि में मैया, हर मस्तक की रेख॥
(जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।)
सिन्धुसुता भाग्येश्वरी, दीजो भाग्य जगाय।
तजकर जग को हम तेरी, शरण में आए आय॥
तू वैकुण्ठनिवासिनी, हम नरकों के जीव।
प्राणहीन इस देह को, कर दो माँ सजीव॥
कमला, वैभवलक्ष्मी, सुख-सिद्धि तेरे पास।
सागर तट पर हम प्यासे, मैया बुझा दो प्यास॥
(जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।)
धन-धान्य से घर हमारे, सदा रहे भरपूर।
हर्ष के फूल खिलाकर, काँटे कर दो दूर॥
तेरी अलौकिक माया से, भागें दुःख-संताप।
रोम-रोम माँ करे तेरा, मंगलकारी जाप॥
हरिप्रिया हे मातेश्वरी, कृपा की दृष्टि कर।
अन्न, धन और सम्पत्ति से, भरा रहे यह घर॥
(जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता।)
सागर-मन्थन से प्रकट हुई, ज्योति अपरम्पार।
मन से चिन्तन हम करें, हर लो सबकी चिन्ता-भार॥
मन से चिन्तन हम करें, सबकी चिन्ता हर॥
जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता, जय लक्ष्मी माता॥
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🌷 लक्ष्मी अमृतवाणी भजन (२) 🌷
दोहा
सुमिरि महालक्ष्मी चरण, धरि हियँ ध्यान अपार।
बरनिअ अमृतबानि अब, सकल सुखनि को सार॥
चौपाई
जय जय माता लक्ष्मी रानी, सब सुख देवनहार भवानी॥
विष्णुप्रिया कमला सुखदानी, तुम हो जगत की महारानी॥
क्षीरसिन्धु ते प्रकट भई तुम, सकल सृष्टि की माता हो तुम।
इन्दिरा, रमा, हरिप्रिया कहाई, भक्तन की तुम विपत्ति नसाई॥
सुवर्ण आभा, चंचल चरना, तुम्हरो ध्यान सदा जो करना।
ताके घर में मंगल होई, दुःख-दरिद्र न व्यापै कोई॥
पंकज आसन राजत सुन्दर, रूप अलौकिक त्रिभुवन अन्दर। चतुर्भुज रूप तुम्हारी माता, कमल पुष्प सोहत दोउ हाथा॥
अभय-वरद करमुद्रा साजे, दिव्य मुकुट सिर ऊपर राजे। कुण्डल-मणि कानन में सोहैं, छवि देखत सब जन मन मोहैं॥
घर-घर तुम्हरी ज्योति विराजे, दीपमालिका मुदित बिराजे।
जेहि घर तुम पद-पंकज धरहू, सो घर कंचनधाम करहू॥
जे नर करै महालक्ष्मी पूजा, ता सम धन्य न जगत में दूजा। प्रातःकाल जो नाम उचारे, ताको कबहुँ न दुःख बिसारे॥
अष्टसिद्धि, नव निधि की दाता, तुम हो संकट हरनी माता।
जो जन पढ़ै अमृतवाणी, तापर कृपा करहु महारानी॥
छन्द / सवैया
शीश मुकुट धरे, उर माल रसाल, मणि-काञ्चन भेष सुहावै।
भक्तन के हित कारन मात भवानी, सदा सुख-मंगल गावै
जो नर नेम धरै मन में नित, ध्यान तिहारो ही शीश नवावै।
ताके मनोरथ पूरन होत हैं, दास सदा गुन गावत आवै॥
दोहा
बन्दौं पद कमलासनै, सब दुःख हरनि सुखदाइ।
महालक्ष्मी मातु तुम, सदा करहु सहाइ॥
🌷॥ श्री विष्णुप्रिया महालक्ष्मी अमृतवाणी भजन (३) ॥ 🌷
विष्णुप्रिया हे चराचरस्वामिनि,
माता सुरेश्वरि, काज सँवारो।
तेरी कृपा बिन सूना है जीवन,
सेवक के घर आज पधारो॥
नित्य जपूँ मैं तेरे नाम की माला,
मेरे दुःखों को कृपा कर टारो।
सिन्धुसुता हे दुर्भाग्यविनाशिनि,
माँ लक्ष्मी! मेरी ओर निहारो॥
हे भृगुकन्या! तुम्हारी दया से ही,
स्वर्ग में सुख-वैभव छाया।
आनन्दित रहते सभी देवता,
यह सब है तुम्हारी ही माया॥
दिव्य प्रभाव से हे जगदम्बे,
सब लोकों को भव्य बनाया।
ब्रह्मा ने तो सृष्टि रची है,
तुमने उसको सुन्दर सजाया॥
अष्टस्वरूप धारण कर माता,
भक्तजनों के कष्ट मिटाए।
गजलक्ष्मी बन कीर्ति बढ़ाई,
निष्काम भक्तों का मान बढ़ाए॥
झोपड़ियों को महल बनाया,
कण-कण में तेरा तेज समाया।
जो भी शरणागत हुआ तुम्हारा,
तीनों लोकों ने उसका यश गाया॥
तुम बिन यज्ञ पूर्ण न होते,
शुभ कार्य भी सिद्ध न हो पाते।
तुम बिन मानव साहस खोकर,
व्याकुल होकर अश्रु बहाते॥
ज्ञानी, गुणी, बलवान, यतीजन,
तेरे बिना सभी अकुलाते।
माँ लक्ष्मी! हम पर प्रसन्न रहना,
हम तो तेरा नित्य ध्यान लगाते॥
हे कमला! करुणास्वरूपिणि,
महिमा तेरी अति न्यारी।
रंक को राजा बना देती हो,
तेरी महिमा अपरम्पार निराली॥
दानव हों अथवा देवगण,
सब तेरे ही शरण पुजारी।
हम पर भी दृष्टि करो भयमोचिनि,
हम हैं तेरी दया के भिखारी॥
शीश सुशोभित दिव्य मुकुट से,
चतुर्भुज रूप सभी के मन भावे।
कर्णकुण्डल और कण्ठहार,
मन्द-मन्द मुस्कान अति सुहावे॥
पाँवों में पायल बाजे छन-छन,
अद्भुत छवि रति-काम लजावे।
कष्ट न आए कभी निकट उसके,
जो यह छवि हृदय में बसावे॥
जय जय माँ भार्गवी भुवनेश्वरि,
जय जय वैकुण्ठनिवासिनि मैया।
जय यश, कीर्ति, वैभवदायिनि,
जय पंकजासनवासिनि मैया॥
पापविनाशिनि, पुण्यप्रकाशिनि,
अघहारिणि, अविनाशिनि मैया।
जय लक्ष्मी! शुभमंगलकारिणि,
दुःख-दारिद्र्यविनाशिनि मैया॥
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दीपावली महात्मय एवं पूजन विधि
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हर वर्ष भारतवर्ष में दिवाली का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. प्रतिवर्ष यह कार्तिक माह की अमावस्या को मनाई जाती है. रावण से दस दिन के युद्ध के बाद श्रीराम जी जब अयोध्या वापिस आते हैं तब उस दिन कार्तिक माह की अमावस्या थी, उस दिन घर-घर में दिए जलाए गए थे तब से इस त्योहार को दीवाली के रुप में मनाया जाने लगा और समय के साथ और भी बहुत सी बातें इस त्यौहार के साथ जुड़ती चली गई।
“ब्रह्मपुराण” के अनुसार आधी रात तक रहने वाली अमावस्या तिथि ही महालक्ष्मी पूजन के लिए श्रेष्ठ होती है. यदि अमावस्या आधी रात तक नहीं होती है तब प्रदोष व्यापिनी तिथि लेनी चाहिए. लक्ष्मी पूजा व दीप दानादि के लिए प्रदोषकाल ही विशेष शुभ माने गए हैं।
दीपावली पूजन के लिए पूजा स्थल एक दिन पहले से सजाना चाहिए पूजन सामग्री भी दिपावली की पूजा शुरू करने से पहले ही एकत्रित कर लें। इसमें अगर माँ के पसंद को ध्यान में रख कर पूजा की जाए तो शुभत्व की वृद्धि होती है। माँ के पसंदीदा रंग लाल, व् गुलाबी है। इसके बाद फूलों की बात करें तो कमल और गुलाब मां लक्ष्मी के प्रिय फूल हैं। पूजा में फलों का भी खास महत्व होता है। फलों में उन्हें श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े पसंद आते हैं। आप इनमें से कोई भी फल पूजा के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। अनाज रखना हो तो चावल रखें वहीं मिठाई में मां लक्ष्मी की पसंद शुद्ध केसर से बनी मिठाई या हलवा, शीरा और नैवेद्य है। माता के स्थान को सुगंधित करने के लिए केवड़ा, गुलाब और चंदन के इत्र का इस्तेमाल करें।
दीये के लिए आप गाय के घी, मूंगफली या तिल्ली के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह मां लक्ष्मी को शीघ्र प्रसन्न करते हैं। पूजा के लिए अहम दूसरी चीजों में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर, भोजपत्र शामिल हैं।
पूजा की चौकी सजाना
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(1) लक्ष्मी, (2) गणेश, (3-4) मिट्टी के दो बड़े दीपक, (5) कलश, जिस पर नारियल रखें, वरुण (6) नवग्रह, (7) षोडशमातृकाएं, (8) कोई प्रतीक, (9) बहीखाता, (10) कलम और दवात, (11) नकदी की संदूक, (12) थालियां, 1, 2, 3, (13) जल का पात्र
सबसे पहले चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजा करने वाले मूर्तियों के सामने की तरफ बैठे। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक है। दो बड़े दीपक रखें। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अलावा एक दीपक गणेशजी के पास रखें।
मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचों बीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें। थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें- 1. ग्यारह दीपक, 2. खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान, 3. फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।
इन थालियों के सामने पूजा करने वाला बैठे। आपके परिवार के सदस्य आपकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।
हर साल दिवाली पूजन में नया सिक्का ले और पुराने सिक्को के साथ इख्ठा रख कर दीपावली पर पूजन करे और पूजन के बाद सभी सिक्को को तिजोरी में रख दे।
पवित्रीकरण
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हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा सा जल ले लें और अब उसे मूर्तियों के ऊपर छिड़कें। साथ में नीचे दिया गया पवित्रीकरण मंत्र पढ़ें। इस मंत्र और पानी को छिड़ककर आप अपने आपको पूजा की सामग्री को और अपने आसन को भी पवित्र कर लें।
शरीर एवं पूजा सामग्री पवित्रीकरण मन्त्र👇
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥
पृथ्वी पवित्रीकरण विनियोग👇
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग षिः सुतलं छन्दः
कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें और मां पृथ्वी को प्रणाम करके मंत्र बोलें-
पृथ्वी पवित्रीकरण मन्त्र👇
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
अब आचमन करें
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पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ केशवाय नमः
और फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ नारायणाय नमः
फिर एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए और बोलिए-
ॐ वासुदेवाय नमः।
शिखा बंधन
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शिखा पर दाहिना हाथ रखकर दैवी शक्ति की स्थापना करें चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते ,तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥
मौली बांधने का मंत्र
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येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
तिलक लगाने का मंत्र
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कान्तिं लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम्।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ॥
यज्ञोपवीत मंत्र
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ॐ यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज:।।
पुराना यगोपवीत त्यागने का मंत्र
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एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं या।
जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्।
न्यास
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संपूर्ण शरीर को साधना के लिये पुष्ट एवं सबल बनाने के लिए प्रत्येक मन्त्र के साथ संबन्धित अंग को दाहिने हाथ से स्पर्श करें
ॐ वाङ्ग में आस्येस्तु - मुख को
ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु - नासिका के छिद्रों को
ॐ चक्षुर्में तेजोऽस्तु - दोनो नेत्रों को
ॐ कर्णयोमें श्रोत्रंमस्तु - दोनो कानो को
ॐ बह्वोर्मे बलमस्तु - दोनो बाजुओं को
ॐ ऊवोर्में ओजोस्तु - दोनों जंघाओ को
ॐ अरिष्टानि मे अङ्गानि सन्तु - सम्पूर्ण शरीर को।
आसन पूजन
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अब अपने आसन के नीचे चन्दन से त्रिकोण बनाकर उसपर अक्षत , पुष्प समर्पित करें एवं मन्त्र बोलते हुए हाथ जोडकर प्रार्थना करें।
ॐ पृथ्वि त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥
इसके बाद संभव हो तो किसी किसी ब्राह्मण द्वारा विधि विधान से पूजन करवाना अति लाभदायक रहेगा। ऐसा संभव ना हो तो सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन कर गणेश जी का ध्यान कर अक्षत पुष्प अर्पित करने के पश्चात दीपक का गंधाक्षत से तिलक कर निम्न मंत्र से पुष्प अर्पण करें।
शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !
दिग् बन्धन
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बायें हाथ में जल या चावल लेकर दाहिने हाथ से चारों दिशाओ में छिड़कें
बायें हाथ में चावल लेकर दायें से ढक कर निम्न मंत्रों का उच्चारण करें
ॐ अपसर्पन्तु ये भूता ये भूता भूमि संस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ।। अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम्। सर्वेषामविरोधेन पूजा. कर्म समारभे।।
बायें हाथ में रखे हुए चावलों को निम्न मंत्रोच्चार करते हुए सभी दिशाओं में उछाल दें
ॐ प्राच्ये नमः पूर्व दिशा में।
ॐ प्रतीच्ये नमः पश्चिम दिशा में।
ॐ उदीच्चे नमः उत्तर दिशा में ।
ॐ अवाच्चै नमः दक्षिण दिशा में ।
ऊँ ऊर्ध्वाय नमः ऊपर की ओर।
ॐ पातालाय नमः नीचे की ओर।
गणेश स्मरण
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सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
श्री गुरु ध्यान
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अस्थि चर्म युक्त देह को ही गुरु नहीं कहते अपितु इस देह में जो ज्ञान समाहित है उसे गुरु कहते हैं , इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये उन्होने जो तप और त्याग किया है , हम उन्हें नमन करते हैं , गुरु हीं हमें दैहिक , भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का ज्ञान देतें हैं इसलिये शास्त्रों में गुरु का महत्व सभी देवताओं से ऊँचा माना गया है , ईश्वर से भी पहले गुरु का ध्यान एवं पूजन करना शास्त्र सम्मत कही गई है।
द्विदल कमलमध्ये बद्ध संवित्समुद्रं । धृतशिवमयगात्रं साधकानुग्रहार्थम् ॥
श्रुतिशिरसि विभान्तं बोधमार्तण्ड मूर्तिं ।
शमित तिमिरशोकं श्री गुरुं भावयामि ॥
ह्रिद्यंबुजे कर्णिक मध्यसंस्थं ।
सिंहासने संस्थित दिव्यमूर्तिम् ॥
ध्यायेद् गुरुं चन्द्रशिला प्रकाशं ।
चित्पुस्तिकाभिष्टवरं दधानम् ॥
श्री गुरु चरणकमलेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि।
॥ श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः प्रार्थनां समर्पयामि , श्री गुरुं मम हृदये आवाहयामि मम हृदये कमलमध्ये स्थापयामि नमः ॥
पूजन हेतु संकल्प
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इसके बाद बारी आती है संकल्प की। जिसके लिए पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें- ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2079, तमेऽब्दे नल नामक संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) सोमवासरे चित्रा नक्षत्रे वैधृति योग शकुनि करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।
गणेश पूजन
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किसी भी पूजन की शुरुआत में सर्वप्रथम श्री गणेश को पूजा जाता है। इसलिए सबसे पहले श्री गणेश जी की पूजा करें।
इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र पढ़े –
ध्यानम्
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खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं
प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्।
दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दुरशोभाकरं वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥
ॐ गं गणपतये नमः ध्यानं समर्पयामि ।
ॐ गजाननम्भूतगणादिसेवितं
कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकं
नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।
गणपति आवाहन:👉 ॐ गणानां त्वां गणपति ( गूं ) हवामहे प्रियाणां त्वां प्रियपति ( गूं ) हवामहे निधीनां त्वां निधिपति ( गूं ) हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥
एह्येहि हेरन्ब महेशपुत्र समस्त विघ्नौघविनाशदक्ष।
माङ्गल्य पूजा प्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः गणपतिमावाहयामि , स्थापयामि , पूजयामि
ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहने के बाद पात्र में अक्षत छोड़ दे।
आसन
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अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं परिगृह्यताम ॥
ॐ गं गणपतये नमः आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि।
स्नान
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॥ मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः पद्यं , अर्ध्यं , आचमनीयं च स्नानं समर्पयामि , पुनः आचमनीयं जलं समर्पयामि । (पांच आचमनि जल प्लेटे मे चदायें )
वस्त्र
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सर्वभुषादिके सौम्ये लोके लज्जानिवारणे , मयोपपादिते तुभ्यं गृह्यतां वसिसे शुभे ॥
ॐ गं गणपतये नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
यज्ञोपवीत
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ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवितेनोपनह्यामि।
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् ।
उपवीतंमया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ गं गणपतये नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि , यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
चन्दन
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ॐ श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरं, विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः चन्दनं समर्पयामि ।
अक्षत
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अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ गं गणपतये नमः अक्षतान् समर्पयामि ।
पुष्प
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माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः, मयाऽऽ ह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यतां॥
ॐ गं गणपतये नमः पुष्पं बिल्वपत्रं च समर्पयामि।
दूर्वा
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दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान् , आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक ॥
ॐ गं गणपतये नमः दूर्वाङ्कुरान समर्पयामि।
सिन्दूर
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सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् , शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः सिदुरं समर्पयामि ।
धूप
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॥ वनस्पति रसोद् भूतो गन्धाढयो सुमनोहरः, आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ गं गणपतये नमः धूपं आघ्रापयामि ।
दीप
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साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया , दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः दीपं दर्शयामि ।
नैवैद्य
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शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च , आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवैद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः नैवैद्यं निवेदयामि नानाऋतुफलानि च समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ताम्बूल
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पूगीफलं महद्दिव्यम् नागवल्लीदलैर्युतम् एलालवङ्ग संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ गं गणपतये नमः ताम्बूलं समर्पयामि ।
दक्षिणा
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हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ गं गणपतये नमः कृतायाः पूजायाः सद् गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि।
आरती
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कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् , आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव ॥
ॐ गं गणपतये नमः आरार्तिकं समर्पयामि ।
मन्त्रपुष्पाञ्जलि
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नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद् भवानि च पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहान परमेश्वर ॥
ॐ गं गणपतये नमः मन्त्रपुष्पाञ्जलिम् समर्पयामि ।
प्रदक्षिणा
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यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च, तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥
ॐ गं गणपतये नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि ।
विशेषार्ध्य
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रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक , भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात् ।
द्वैमातुर कृपासिन्धो षाण्मातुराग्रज प्रभो , वरदस्त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद ॥
अनेन सफलार्ध्येण वरदोऽस्तु सदा मम ॥
ॐ गं गणपतये नमः विशेषार्ध्य समर्पयामि।
प्रार्थना
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विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगध्दिताय
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते
नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नमः
विश्वरूपस्वरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति भक्तप्रियेति शुखदेति फलप्रदेति
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः।
ॐ गं गणपतये नमः प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।
( साष्टाङ्ग नमस्कार करे )
समर्पण
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गणेशपूजने कर्म यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम ॥
अनया पूजया गणेशे प्रियेताम् , न मम ।
( ऐसा कहकार समस्त पूजनकर्म भगवान् को समर्पित कर दें ) तथा पुनः नमस्कार करें ।
लक्ष्मी पूजन
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ध्यान
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पद्मासनां पद्मकरां पद्ममालाविभूषिताम् क्षीरसागर संभूतां हेमवर्ण - समप्रभाम् ।
क्षीरवर्णसमं वस्त्रं दधानां हरिवल्लभाम्
भावेय भक्तियोगेन भार्गवीं कमलां शुभाम्
सर्वमंगलमांगल्ये विष्णुवक्षःस्थलालये
आवाहयामि देवी त्वां क्षीरसागरसम्भवे
पद्मासने पद्मकरे सर्वलोकैकपूजिते
नारायणप्रिये देवी सुप्रीता भव सर्वदा।
आवाहन
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सर्वलोकस्य जननीं सर्वसौख्यप्रदायिनीम्
सर्वदेवमयीमीशां देविमावाहयाम्यम्
ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्
ॐ महालक्ष्म्यै नमः महालक्ष्मीमावाहयामि , आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि
आसन
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अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् । इदं हेममयं दिव्यमासनं परिगृह्यताम ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनार्थे पुष्पं समर्पयाम ।
पाद्य
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गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्य आनीतं तोयमुत्तमम् । पाद्यार्थं ते प्रदास्यामि गृहाण परमेश्वरी ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि। ( जल चढ़ाये )
अर्ध्य
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गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्ध्यं सम्पादितं मया । गृहाण त्वं महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः हस्तयोः अर्ध्यं समर्पयामि।
( चन्दन , पुष्प , अक्षत , जल से युक्त अर्ध्य दे )
आचमन
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कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु शीतलम्। तोयमाचमनीयार्थं गृहाण परमेश्वरी॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः आचमनं समर्पयामि।
( कर्पुर मिला हुआ शीतल जल चढ़ाये )
स्नान
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मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्। तदिदं कल्पितं देवी स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः स्नानार्थम जलं समर्पयामि। ( जल चढ़ाये )
वस्त्र
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सर्वभूषादिके सौम्ये लोक लज्जानिवारणे। मयोपपादिते तुभ्यं गृह्यतां वसिसे शुभे ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि, आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
( दो मौलि के टुकड़े अर्पित करें एवं एक आचमनी जल अर्पित करें )
चन्दन
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श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरं। विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः चन्दनं समर्पयामि । ( मलय चन्दन लगाये )
कुङ्कुम
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कुङ्कुमं कामदं दिव्यं कामिनीकामसम्भवम् । कुङ्कुमेनार्चिता देवी कुङ्कुमं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः कुङ्कुमं समर्पयामि । ( कुङ्कुम चढ़ाये )
सिन्दूर
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सिन्दूरमरुणाभासं जपाकुसुमसन्निभम् । अर्पितं ते मया भक्त्या प्रसीद परमेश्वरी ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि । ( सिन्दूर चढ़ाये )
अक्षत
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अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरी॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि ।
( साबुत चावल चढ़ाये )
आभूषण
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हारकङकणकेयूरमेखलाकुण्डलादिभिः । रत्नाढ्यं हीरकोपेतं भूषणं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः आभूषणानि समर्पयामि। ( आभूषण चढ़ाये )
पुष्प
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माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः। मयाऽह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यतां।
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पं समर्पयामि । ( पुष्प चढ़ाये )
दुर्वाङकुर
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तृणकान्तमणिप्रख्यहरिताभिः सुजातिभिः। दुर्वाभिराभिर्भवतीं पूजयामि महेश्वरी ॥
श्री महालक्ष्मये देव्यै नमः दुर्वाङ्कुरान समर्पयामि। ( दूब चढ़ाये )
अङ्ग - पूजा
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कुङ्कुम, अक्षत, पुष्प से निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए अङ्ग - पूजा करे।
ॐ चपलायै नमः , पादौ पूजयामि
ॐ चञ्चलायै नमः , जानुनी पूजयामि
ॐ कमलायै नमः , कटिं पूजयामि
ॐ कात्यायन्यै नमः , नाभिं पूजयामि
ॐ जगन्मात्रे नमः , जठरं पूजयामि
ॐ विश्ववल्लभायै नमः, वक्षः स्थलं पूजयामि
ॐ कमलवासिन्यै नमः, हस्तौ पूजयामि
ॐ पद्माननायै नमः, मुखं पूजयामि
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः, नेत्रत्रयं पूजयामि
ॐ श्रियै नमः, शिरः पूजयामि
ॐ महालक्ष्मै नम:, सर्वाङ्गं पूजयामि
अष्टसिद्धि - पूजन
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कुङ्कुम, अक्षत, पुष्प से निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए आठों दिशाओं में आठों सिद्धियों की पूजा करे।
१ - ॐ अणिम्ने नमः ( पूर्वे )
२- ॐ महिम्ने नमः ( अग्निकोणे )
३ - ॐ गरिम्णे नमः ( दक्षिणे )
४ - ॐ लघिम्णे नमः ( नैर्ॠत्ये )
५ - ॐ प्राप्त्यै नमः ( पश्चिमे )
६ - ॐ प्राकाम्यै नमः ( वायव्ये )
७ - ॐ ईशितायै नमः ( उत्तरे )
८ - ॐ वशितायै नमः ( ऐशान्याम् )
अष्टलक्ष्मी पूजन
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कुङ्कुम , अक्षत , पुष्प से निम्नलिखित नाम - मंत्र पढ़ते हुए आठ लक्ष्मियों की पूजा करे
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः ,
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः ,
ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः ,
ॐ अमृतलक्ष्म्यै ,
ॐ कामलक्ष्म्यै नमः ,
ॐ सत्यलक्ष्म्यै नमः ,
ॐ भोगलक्ष्म्यै नमः ,
ॐ योगलक्ष्म्यै नमः
धूप
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वनस्पति रसोद् भूतो गन्धाढ्यो सुमनोहरः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि । ( धूप दिखाये )
दीप
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साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः दीपं दर्शयामि ।
नैवैद्य
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शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च । आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवैद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवैद्यं निवेदयामि। पुनः आचमनीयं जलं समर्पयामि।
( प्रसाद चढ़ाये एवं इसके बाद आचमनी से जल चढ़ाये )
ऋतुफल
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इदं फलं मया देवी स्थापितं पुरतस्तव। तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः ॠतुफलानि समर्पयामि ( फल चढ़ाये )
ताम्बूल
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पूगीफलं महद्दिव्यम् नागवल्लीदलैर्युतम् । एलालवङ्ग संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि । (पान चढ़ाये )
दक्षिणा
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हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि । ( दक्षिणा चढ़ाये )
कर्पूरआरती
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॥ कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् । आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः आरार्तिकं समर्पयामि । (कर्पूर की आरती करें )
जल शीतलीकरण
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ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ( गूं ) शान्ति: , पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: , सर्व ( गूं ) शान्ति: , शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
मन्त्रपुष्पाञ्जलि
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नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद् भवानि च पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहान परमेश्वरि ॥
श्री महालक्ष्म्यै नमः मन्त्रपुष्पाञ्जलिम् समर्पयामि ।
नमस्कार मंत्र
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सुरासुरेन्द्रादिकिरीटमौक्तिकैर्युक्तं सदा यत्तव पादपङ्कजम् परावरं पातु वरं सुमङ्गलं नमामि भक्त्याखिलकामसिद्धये
भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनी सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये
या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात् त्वदर्चनात् श्री महालक्ष्म्यै नम:, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि
लक्ष्मी मन्त्र का जाप अपनी सुविधनुसार करे
॥ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॥
जप समर्पण👉 (दाहिने हाथ में जल लेकर मंत्र बोलें एवं जमीन पर छोड़ दें)
॥ ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं, सिद्धिर्भवतु मं देवी त्वत् प्रसादान्महेश्वरि॥
श्री लक्ष्मी जी की आरती
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ॐ जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसिदिन सेवत हर - विष्णू - धाता ॥ ॐ जय ॥
उमा , रमा , ब्रह्माणी , तुम ही जग - माता
सूर्य - चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता ॥ ॐ जय ॥
दुर्गारुप निरञ्जनि , सुख - सम्पति - दाता
जो कोइ तुमको ध्यावत , ऋधि - सिधि - धन पाता ॥ ॐ जय ॥
तुम पाताल - निवासिनि , तुम ही शुभदाता
कर्म - प्रभाव -प्रकाशिनि , भवनिधिकी त्राता ॥ ॐ जय ॥
जिस घर तुम रहती , तहँ सब सद् गुण आता
सब सम्भव हो जाता , मन नहिं घबराता ॥ ॐ जय ॥
तुम बिन यज्ञ न होते , वस्त्र न हो पाता
खान – पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ ॐ जय ॥
शुभ – गुण – मन्दिर सुन्दर , क्षीरोदधि – जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोइ नहि पाता ॥ ॐ जय ॥
महालक्ष्मी जी कि आरति , जो कोई नर गाता
उर आनन्द समाता , पाप उतर जाता ॥ ॐ जय ॥
क्षमा - याचना👉 मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्युजितं मया देवी परिपूर्ण तदस्तु मे॥ श्री महालक्ष्म्यै नमः क्षमायाचनां समर्पयामि
ना तो मैं आवाहन करना जानता हूँ , ना विसर्जन करना जानता हूँ और ना पूजा करना हीं जानता हूँ । हे परमेश्वरी क्षमा करें । हे परमेश्वरी मैंने जो मंत्रहीन , क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है , वह सब आपकी दया से पूर्ण हो ।
ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु।
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