*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक 03 जुलाई 2026*
*🎈 वार- शुक्रवार*
*🎈 मास - आषाढ़ मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)- रौद्र*
*🎈 अयन - उत्तरायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि - तृतीया 11:19:42 am
*तत्पश्चात चतुर्थी*
*🎈 नक्षत्र - श्रवण 11:45:44* तक* तत्पश्चात् घनिष्ठा*
*🎈योग - विश्कुम्भ 16:58:43* तक , तत्पश्चात् प्रीति*
*🎈करण- विष्टि भद्र 11:19:42* तक,
तत्पश्चात् बव*
*🎈राहुकाल -10:56am से 12:39 pm (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
*🎈चन्द्र राशि - मकर*till 24:47:25*
*🎈चन्द्र राशि - कुम्भ from 24:47:25*
*🎈सूर्य राशि- मिथुन*
*🎈 सूर्योदय - 05:46:03*
*🎈 सूर्यास्त - 19:32:25*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:23 ए एम से 05:04 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त*- 12:12 पी एम से 01:07 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:19 ए एम, जुलाई 04 से 01:00 ए एम, जुलाई 04*
*🎈 अमृत काल - 02:29 ए एम, जुलाई 04 से 04:12 ए एम, जुलाई 04*
*🎈 सर्वार्थ सिद्धि योग 05:45 ए एम से 11:46 ए एम*
*🎈व्रत पर्व विवरण - तृतीया व्रत*
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी, सर्वार्थसिद्धि योग (सुबह 05:45 से सुबह 11:46 तक)*
*🎈 विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🎈विशेष:- आषाढ़ मास महात्म्य *
👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी 💢सेनाधिपति चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💢मन्त्री मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के 💢स्वामी धान्याधिपति बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💢सस्याधिपति गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी
🛟मेघाधिपति चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💢धनाधिपति गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी नीरसाधिपति
💢गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
🛟रसाधिपति शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी फलाधिपति
चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
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🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
*🛟चोघडिया, दिन का🛟*
🛟चोघडिया, रात्🛟*
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🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
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💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺
👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹।। 🔶🔶🌹🌹 🌹
➡️ *।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।
🌺🌷🏓।। ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि से कश्यप, कश्यप से सूर्य और सूर्य से मनु का जन्म हुआ। मनु की कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने यज्ञ करवाया। आज भी हम लोग संतान के लिए मनौती तो मानते ही हैं। अब मनु ने यज्ञ करवाया पुत्र के लिए, पर उनकी पत्नी श्रद्धा को चाहिए थी लड़की। तो श्रद्धा ने यज्ञ करवाने वाले 'होता' से अपने मन की बात कह दी। यज्ञ में चार ब्राह्मण होते हैं होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा। होता ने उनकी इच्छा जान वैसी ही आहुति दी। समय आने पर श्रद्धा ने पुत्री इला को जन्म दिया।
अब मनु को हुआ आश्चर्य कि यज्ञ का फल बदल कैसे गया। बाद में बात खुली। अब समस्या हुई कि यज्ञ का सारा विधान तो पुत्र के लिए किया गया, पर हुई पुत्री। और उसका होना भी कोई गलत विधि से तो हुआ नहीं था। तो उसे ही पुत्र बना दिया गया। नाम रखा गया सुद्दम्न। ये सुद्दम्न बड़े हुए तो एक बार फिर स्त्री बने और पुत्र को जन्म दिया, और बाद में पुनः पुरुष बन गए। खैर, यह अलग कथा है, इसपर फिर कभी बात करेंगे।
उधर श्रद्धा ने बाद ने दस पुत्रों को जन्म दिया। सबसे बड़े थे इक्ष्वाकु (जिनके वंश में प्रभु राम हुए)। बाकी थे नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि।
'पृषध्र' शुद्र हुए। सबसे छोटे पुत्र 'कवि' बचपन से ही वैरागी थे, ईश्वर भक्ति करते हुए वन चले गए। 'करूष' क्षत्रिय हुए। धृष्ट से धार्ष्ट हुए जो ब्राह्मण बन गए। नृग का भी वंश चला।
नरिष्यन्त के वंश में अग्निवेश हुए। इन्हें ही बाद में महर्षि जातूकर्ण्य कहा गया। ब्राह्मणों का आग्निवेश्यायन गोत्र इन्हीं से चला।
दिष्ट के पुत्र नाभाग हुए जो वैश्य हुए।
मनु के पुत्र नभग के पुत्र का नाम भी नाभाग था। इन नाभाग के बेटे थे अम्बरीष।
अम्बरीष भगवान के बड़े भक्त थे और समस्त संसार के राजा भी। सब कुछ था उनके पास, पर वे सब कुछ भगवान का मान अपना कर्तव्य करते चले जाते। एक बार उन्होंने वर्ष भर के लिए द्वादशीप्रधान एकादशी व्रत लिया। व्रत की समाप्ति पर पूजा वगैरह करके ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करने की अनुमति मांगी। पारण मतलब व्रत के बाद स्वयं कुछ खाना, जिसे हम लोग आमभाषा में व्रत तोड़ना कहते हैं।
वे जैसे ही खाने के लिए जाने वाले थे, स्वयं ऋषि दुर्वासा आ गए। अब इतने महान ऋषि के आने पर उनका स्वागत, उनकी पूजा तो करनी ही थी। राजा अम्बरीष ने उनका समुचित सम्मान किया और निवेदन किया कि मेरा व्रत समाप्त हुआ, आप भी आ गए तो पहले आप भोजन कर लें, फिर मैं भी अपना व्रत तोड़ूं। दुर्वासा मान गए और नहाने चले गए।
दूर से थके आये होंगे, नदी में उतरे तो चित्त शांत हुआ होगा, या प्रभु का ध्यान करने लगे होंगे। कुल मिलाकर देर करने लगे। अब उधर द्वादशी समाप्त होने में थोड़ा ही समय बचा था। व्रत करने के नियम हैं तो व्रत तोड़ने के भी नियम हैं। समय पर व्रत तोड़ना जरूरी है। अम्बरीष को चिंता हुई कि ऐसे तो व्रत का कोई अर्थ ही न रह जायेगा। तो बाकी ब्राह्मणों से पूछा। ब्राह्मणों ने उपाय बताया कि आप पानी पी लीजिए। पानी पीकर पारण (व्रत टूटना) हो भी जाएगा, और पानी कोई अन्न तो है नहीं तो पारण नहीं भी होगा। जब दुर्वासा जी आ जाये तो उन्हें भोजन करा कर खुद भी भोजन कर लीजिएगा। अम्बरीष ने पानी पी लिया।
दुर्वासा अपना भरपूर समय लेकर, खूब देर तक स्नान-ध्यान करके लौटे तो देखा कि अम्बरीष भोजन की थालियां लगाकर खड़े हैं, पर वे समझ गए कि अगले ने मेरी प्रतीक्षा नहीं की। बिना मुझे भोजन कराए ही इसने व्रत तोड़ लिया। इतना अहंकार, ऐसी अमर्यादा कि अतिथि को भोजन कराए बिना ही पारण कर लिया। मुझे इतनी भूख लगी और इस दुष्ट ने मेरा ऐसा अपमान किया। क्रोध से कांपने लगे। आंखें चढ़ गई, मुँह विकृत हो गया, लगे सुनाने कि कैसा पापी है, धन और सत्ता का ऐसा मद, धर्म का ऐसा उल्लंघन, मुझे अतिथि बनाकर भोजन के लिए निमंत्रण दिया और मुझसे पहले ही खुद ठूँस लिया। रुक अभी तुझे मजा चखाता हूँ।
और झट से अपनी एक जटा उखाड़ कर भूमि पर पटक दी। उससे एक महाभयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और वह चींखती हुई तलवार हाथ में लेकर अम्बरीष को मारने के लिए झपटी। बस एक क्षण की बात थी कि अम्बरीष मरे पड़े होते, पर एकाएक ही जाने क्या हुआ कि स्वयं वह कृत्या ही कई टुकड़ों में कटी, भूमि पर पड़ी तड़पती दिखी और अगले ही पल जल कर भस्म हो गई। अम्बरीष, वहां उपस्थित सभी लोगों ने और स्वयं दुर्वासा ने देखा कि एक चक्र बड़ी तेजी से घूम रहा है और अब वह दुर्वासा की ओर बढ़ रहा है।
दुर्वासा, जिनसे संसार कांपता था, उन्होंने अपनी धोती उठाई और दौड़ लगा दी। आगे-आगे दुर्वासा, पीछे-पीछे सुदर्शन चक्र। नदी-नाला, जंगल-पहाड़, जिधर भी भागो, सुदर्शन पीछा न छोड़े। दुर्वासा भागते-भागते पहुंचे ब्रह्मा के पास और गिड़गिड़ाने लगे कि बचा लो मुझे। ब्रह्मा बोले कि मेरी भी एक आयु है, समय आने पर भगवान अपनी सृष्टि समेटेंगे तो मेरा यह लोक भी लीन हो जाएगा। मने कुल मिलाकर इधर-उधर की बातें ही की, क्यों न करते, बचा तो सकते नहीं थे।
दुर्वासा ने फिर अपनी धोती उठाई और महादेव के पास पहुंच गए। महादेव भी ब्रह्मा जैसी ही बातें करने लगे कि भाई, हम तो उसी प्रभु के अंश भर हैं, अब वे ही तुम्हारे पीछे पड़े हैं तो हम इसमें क्या ही कर सकते हैं।
यहाँ भी कुछ न होता देख दुर्वासा लपके वैकुंठ और विष्णु जी के पैरों में लोट ही गए कि कम से कम आप तो बचा लो। अंतिम आसरा आप ही हो।
विष्णु बोले कि अगर मुझमें तुम्हें बचाने की सामर्थ्य है तो वह तो ब्रह्मा जी और शंकर जी में भी है। अगर वे दोनों नहीं बचा पाए तो मैं भी क्या ही कर सकता हूँ। मैं भी तो उन्हीं के समान हूँ, उन्हीं की भांति परमेश्वर का एक अंश।
दुर्वासा ने सिर पीट लिया कि क्या गड़बड़झाला है भाई। ब्रह्मा कह रहे कि ईश्वर का अंश हूँ, तो महादेव के पास गया, उन्होंने भी कहा कि वे नहीं बचा सकते, ईश्वर के पास जाओ, अब विष्णु भी यही कह रहे। आखिर कौन किसका भाग है, कौन किससे निकला है, कौन सकल है, और कौन अंश है। और सबसे बड़ी बात कि जब ब्रह्मा, शंकर और विष्णु नहीं हैं ईश्वर तो कौन है? किसके पास जाऊं कि प्राण बचे। उधर वह सुदर्शन बढ़ा चला आ रहा। गर्दन कटे उससे पहले एक बार और प्रयास करता हूँ। विष्णु के चरण पकड़कर बोले कि अब जो हो, बचाइए मुझे। आप तीनों ही मुझे टाल रहे हैं, आप तीनों ही ईश्वर हैं, एक-दूसरे के अंश हैं, उसी ईश्वर के तीन रूप हैं। सुदर्शन हो या त्रिशूल, वह आपकी ही आज्ञा मानते हैं। आप सर्वशक्तिमान हैं, संसार आपकी इच्छा पर चलता है। आप बस उपाय बताइए।
विष्णु हँसकर बोले कि यह तुम्हारा भ्रम है। मैं कत्तई स्वतन्त्र नहीं, अपितु भक्तों के अधीन हूँ। जो भक्त मुझमें आस्था रखता है, मैं उसमें आस्था रखता हूँ। जिनके हृदय में मैं हूँ, मेरे हृदय में वे हैं। आप इस विप्पति में किस कारण पड़े हैं, वह तो आपको ज्ञात ही है। उपाय तो बड़ा सरल सा है।
दुर्वासा को बात समझ आ गई और वे भागे-भागे अम्बरीष के पास आये और बहुत पछतावा दिखाते हुए अम्बरीष के पैर पकड़ लिए। बस, सुदर्शन गायब हो गया।
इस कथा से जो सीख मिलती है, वह तो स्पष्ट ही है। एक दूसरी सीख भी मिलती है कि ये शुद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण वगैरह कोई ऊंच-नीच की बात नहीं। सब आपस में सम्बन्धी हैं। एक ही बाप के बेटे। जो लोग जन्म से जाति की बात करते हैं, श्रेष्ठता और निम्नता की बात करते हैं, उन्हें अपने शास्त्रों को पुनः पलटने की आवश्यकता है।
" तद् यद् रुदितात् समभवन् तस्माद् रुद्राः । "
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" नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम् "
🛟॥ श्री हरिः ॐ ॥☀️
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹। 💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱🔥🔱🌿





