Type Here to Get Search Results !

आज का पञ्चाङ्ग

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis


*🎈दिनांक  27 जून 2026*
*🎈 वार- शनिवार*
*🎈 मास -  ज्येष्ठ मास*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर    पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)-    रौद्र*
*🎈 अयन - उत्तरायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि    -    त्रयोदशी    24:42:46**
*तत्पश्चात  चतुर्दशी*
*🎈 नक्षत्र -         अनुराधा    22:10:11 तक* तत्पश्चात्      अनुराधा*
*🎈योग    -         साध्य    12:31:19* तक तत्पश्चात् साध्य*
*🎈करण-        कौलव    11:31:38* तक तत्पश्चात् तैतुल*
*🎈राहुकाल -09:11am  से 10:55 pm (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
*🎈चन्द्र राशि    -   वृश्चिक*
*🎈सूर्य राशि-       मिथुन*
*🎈 सूर्योदय -   05:43:59*
*🎈 सूर्यास्त -        19:32:12* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पूर्व दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:21 ए एम से 05:02 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त* 12:10 पी एम से 01:06 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:13 ए एम, जून 28 से 12:59 ए एम, जून 28*
*🎈 अमृत काल -    10:31 ए एम से 12:19 पी एम*
*🎈 रवि योग    -10:11 पी एम से 05:43 ए एम, जून 28    *

*🎈 व्रत एवं पर्व विवरण. ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्म खंड) के अनुसार, त्रयोदशी तिथि के दिन बैंगन (Brinjal) खाना पूर्णतः वर्जित है. शास्त्रों में इस तिथि को बैंगन का सेवन करने का निषेध बताया गया है। 
*🎈विशेष - त्रयोदशी प्रदोष व्रत*
*🎈विशेष:- जेष्ठ मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💢सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💢मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के 💢स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💢सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    
🛟मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💢धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    
💢गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
🛟रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    
चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
kundli


      🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴 

  
      
        🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
         *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
day




           🛟चोघडिया, रात्🛟*
night


 
★√*★√*★√*★√*★√*★√*★√*

     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹।। 🔶🔶🌹🌹 🌹
       ➡️ *।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।
    🌺🌷🏓।।  जय श्री राम  ।।

॥ 🌹🌹🌹🌹कुण्डली का वह भाव जहाँ ईश्वर आपको आपकी इच्छा नहीं बल्कि आपकी आवश्यकता देता है ।।
-------------------------------------------------------
🏵️मनुष्य का जीवन इच्छाओं से चलता है। वह कुछ पाने के लिए प्रयत्न करता है। कुछ बनने के लिए संघर्ष करता है। उसे लगता है कि यदि उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाए तो जीवन सुखमय हो जाएगा। किन्तु समय के साथ एक गहरा सत्य सामने आता है। जीवन में जो कुछ प्राप्त हुआ उससे अधिक महत्व कई बार उस बात का होता है जो प्राप्त नहीं हुई।।
☘️वैदिक ज्योतिष केवल यह नहीं बताती कि जीवन में क्या मिलेगा और क्या नहीं मिलेगा। वह यह भी बताती है कि आत्मा किस उद्देश्य से इस संसार में आई है। कुण्डली के कुछ भाव ऐसे होते हैं जहाँ मनुष्य अपनी इच्छाएँ लेकर पहुँचता है, किन्तु वहाँ से उसे वह मिलता है जिसकी उसकी आत्मा को आवश्यकता होती है। प्रारम्भ में यह व्यवस्था कठोर प्रतीत होती है, परन्तु काल के साथ वही अनुभव जीवन का सबसे बड़ा वरदान सिद्ध होता है।।
☘️षष्ठ भाव ऐसा ही एक क्षेत्र है। यह भाव रोग, ऋण, शत्रु, संघर्ष और परिश्रम का भाव माना गया है। कोई भी व्यक्ति इन परिस्थितियों की कामना नहीं करता। फिर भी अनेक कुण्डलियों में षष्ठ भाव, उसका स्वामी अथवा शनि ऐसे योग बनाते हैं जो जीवन को सहज नहीं रहने देते।।
☘️जब शनि षष्ठ भाव से संबंध बनाता है तो व्यक्ति को बार बार श्रम करना पड़ता है। उसे लगता है कि उसके मार्ग में बाधाएँ ही बाधाएँ हैं। वह सुविधा चाहता है, पर शनि उसे सहनशक्ति देता है। वह शीघ्र सफलता चाहता है, पर शनि उसे धैर्य प्रदान करता है। उस समय जातक को यह व्यवस्था कठोर लगती है, किन्तु यही संघर्ष उसे ऐसा व्यक्तित्व प्रदान करता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।।
☘️अष्टम भाव इस रहस्य को और गहराई से प्रकट करता है। यह भाव जीवन के उन परिवर्तनों का संकेत देता है जिन पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं होता। अचानक हानि, संबंधों का टूटना, विश्वासघात, मानसिक आघात और जीवन की अप्रत्याशित घटनाएँ इसी भाव के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।।
☘️जब अष्टम भाव, उसका स्वामी अथवा केतु जीवन में सक्रिय होते हैं तो व्यक्ति को लगता है कि उसके हाथ से सब कुछ निकलता जा रहा है। वह स्थिरता चाहता है, पर जीवन उसे परिवर्तन देता है। वह सुरक्षा चाहता है, पर जीवन उसे अनिश्चितता के मध्य खड़ा कर देता है। बाद में वही अनुभव उसके भीतर ऐसी परिपक्वता उत्पन्न करते हैं जो किसी विद्यालय या ग्रंथ से प्राप्त नहीं हो सकती।।
☘️द्वादश भाव त्याग का पाठ पढ़ाता है। यह भाव व्यय, वियोग, एकांत और मोक्ष से जुड़ा हुआ है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ संचित करना चाहता है। कोई धन संचित करता है, कोई संबंध, कोई प्रतिष्ठा और कोई अधिकार ,किन्तु जब द्वादश भाव सक्रिय होता है तो जीवन धीरे धीरे यह समझाने लगता है कि हर वस्तु को सदा के लिए पकड़े रखना संभव नहीं है। व्यक्ति प्राप्ति चाहता है, जबकि जीवन उसे त्याग का महत्व समझा रहा होता है। प्रारम्भ में यह हानि प्रतीत होती है, किन्तु बाद में यही त्याग मन को हल्का और निर्मल बना देता है।।
☘️शनि का प्रभाव यहाँ विशेष रूप से समझने योग्य है। शनि कभी व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार नहीं चलाता। वह उसे उसके कर्मों के अनुसार चलाता है। इसी कारण शनि की दशा, साढ़ेसाती अथवा महत्वपूर्ण गोचर के समय मनुष्य को प्रतीक्षा करनी पड़ती है।।
☘️अनेक जातक पूछते हैं कि यदि भाग्य में योग है तो फल मिलने में विलंब क्यों हो रहा है। इसका उत्तर प्रायः शनि देता है। वह पहले पात्रता का निर्माण करता है और उसके बाद फल प्रदान करता है। मनुष्य फल चाहता है, जबकि शनि उसे उस फल को धारण करने योग्य बना रहा होता है।।
☘️केतु का प्रभाव और भी सूक्ष्म होता है। केतु जिस भाव में स्थित होता है वहाँ पूर्ण संतोष नहीं देता। व्यक्ति उस क्षेत्र में उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है, किन्तु भीतर की रिक्तता बनी रहती है।।
यदि केतु द्वितीय भाव में हो तो धन होने पर भी संतोष नहीं मिलता। यदि सप्तम भाव में हो तो संबंधों के मध्य भी कोई अनकहा शून्य अनुभव हो सकता है। यदि दशम भाव में हो तो प्रतिष्ठा मिलने के बाद भी मन तृप्त नहीं होता। केतु मानो यह स्मरण कराता है कि आत्मा की सभी आवश्यकताएँ भौतिक जगत में पूर्ण नहीं होतीं।।
☘️यहीं से ज्योतिष का आध्यात्मिक पक्ष आरम्भ होता है। कुण्डली केवल सुख प्राप्त करने का साधन नहीं है। यह आत्मा की यात्रा को समझने का माध्यम भी है। प्रत्येक ग्रह और प्रत्येक भाव किसी न किसी पाठ का प्रतिनिधित्व करता है।।
☘️गुरु ज्ञान देता है पर उससे पहले अहंकार को तोड़ता है। शनि स्थिरता देता है पर उससे पहले धैर्य की परीक्षा लेता है। केतु वैराग्य देता है पर उससे पहले मोह को कम करता है। राहु ऊँचाइयाँ देता है पर उससे पहले भ्रम के जंगल से गुजारता है।।
☘️इसी कारण कुण्डली के कठिन भावों को केवल अशुभ कह देना वैदिक ज्योतिष की पूर्ण दृष्टि नहीं है। अनेक बार षष्ठ भाव व्यक्ति को योद्धा बनाता है। अष्टम भाव उसे गहन बनाता है। द्वादश भाव उसे मुक्त बनाता है। शनि उसे परिपक्व बनाता है और केतु उसे आत्मबोध की ओर ले जाता है।।
🔸जब बालक छोटा होता है तो वह केवल मिठाई चाहता है। माता उसे भोजन देती है। उस समय बालक को माता कठोर लग सकती है, किन्तु माता उसकी इच्छा नहीं, उसकी आवश्यकता देख रही होती है।ठीक यही सिद्धांत जीवन में भी कार्य करता है।।
🔸मनुष्य अपनी इच्छाओं का लेखा लेकर ईश्वर के पास जाता है। ईश्वर उसकी आत्मा की आवश्यकताओं का विचार करता है। मनुष्य वर्तमान को देखता है। ईश्वर संपूर्ण यात्रा को देखता है। मनुष्य सुख चाहता है। ईश्वर विकास चाहता है। मनुष्य सुविधा चाहता है। ईश्वर सामर्थ्य चाहता है।
🔸कुण्डली का प्रत्येक भाव इसी सत्य का एक अध्याय है।जीवन के उत्तरार्ध में जब मनुष्य पीछे मुड़कर अपनी यात्रा को देखता है तो उसे ज्ञात होता है कि जिन घटनाओं को वह दुर्भाग्य समझ रहा था, उन्हीं ने उसे सबसे अधिक सशक्त बनाया। जिन विलंबों को वह बाधा मान रहा था, उन्हीं ने उसे परिपक्व बनाया। जिन अभावों पर वह रोया था, उन्हीं ने उसे जीवन का वास्तविक मूल्य समझाया।।
🌹शायद इसी कारण ईश्वर हर इच्छा पूरी नहीं करता।क्योंकि वह हमारी प्रार्थना नहीं, हमारी आत्मा का भविष्य सुन रहा होता है ।। 
एस्ट्रो रेणुका दीक्षित ☘️

" तद् यद् रुदितात् समभवन् तस्माद् रुद्राः । "
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
" नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम् "

         🛟॥ श्री हरिः ॐ ॥☀️

    
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹।      💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥
♨️  ⚜️ 🕉🌞  🌞🕉 ⚜🚩*♥️~💕

💥अगर आपको हमारा पंचांग नियमित चाहिए तो आप मुझे इस चैनल को फॉलो करे
https://whatsapp.com/channel/0029Va65aSaKrWR
      ♨️  ⚜️ 🕉🌞  🌞🕉 ⚜🚩
🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ
*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*♥️~अपने घर, ऑफिस, और फैक्ट्री वास्तु के साथ सफल बनाये। जन्मकुंडली, प्रश्नन कुंडली, अंककुंडली, रत्न, जड़, एवं रुद्राक्ष आदि के लिये सम्पर्क करे।*
‼️अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
🙏हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱🌿
vipul

Tags

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Below Post Ad