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आज का पञ्चाङ्ग

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis


*🎈दिनांक  19 जून 2026*
*🎈 वार-  शुक्रवार*
*🎈 मास -  ज्येष्ठ मास*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर    पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)-    रौद्र*
*🎈 अयन - उत्तरायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि    -    पंचमी    16:59:16*
*तत्पश्चात षष्ठी*
*🎈 नक्षत्र -             आश्लेषा    10:05:58 तक* तत्पश्चात्  मघा*
*🎈योग    -         हर्शण    14:52:21* तक तत्पश्चात्  वज्र *
*🎈करण-    बव    05:53:13* तक तत्पश्चात् बालव    16:59:16*
*🎈राहुकाल -10:53am  से 12:36 pm (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)
*🎈चन्द्र राशि-     कर्क    till 10:05:58
चन्द्र राशि       सिंह    from 10:05:58
*🎈सूर्य राशि-       मिथुन*
*🎈 सूर्योदय -   05:42:02
*🎈 सूर्यास्त -        19:30:48* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:20 ए एम से 05:00 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त-  12:09 पी एम से 01:04 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:16 ए एम, जून 20 से 12:57 ए एम, जून 20*
*🎈 अमृत काल-    08:36 ए एम से 10:06 ए एम*
*🎈 रवि योग    -10:06 ए एम से 05:41 ए एम, जून 20*
*🎈 व्रत एवं पर्व विवरण. ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार पंचमी तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है, जिसके तहत इस तिथि के लिए कुछ नियम और वर्जनाएं बताई गई हैं।1. आहार से संबंधित नियम (बेल का सेवन)क्या न करें: पुराण के अनुसार, पंचमी तिथि को बेल का फल (Bael fruit) नहीं खाना चाहिए।क्या मान्यता है: इस दिन बेल खाने से व्यक्ति को कलंक लगता है।
*🎈विशेष - पंचमी व्रत विधान
*🎈विशेष:- जेष्ठ मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💢सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💢मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के 💢स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💢सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    
🛟मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💢धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    
💢गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
🛟रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    
चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
      🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴 

  
      
        🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
         *🛟चोघडिया, दिन का🛟*


           🛟चोघडिया, रात्🛟*
 
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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

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       ➡️ *।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।
    🌺🌷🏓.#👉*जन्माङ्ग से उपासना और ग्रहयोग : ज्योतिषीय दृष्टि से साधना की प्रवृत्ति

वैदिक ज्योतिष केवल विवाह, धन, संतान या व्यवसाय तक सीमित नहीं है। इसके सबसे सूक्ष्म और गूढ़ विषयों में से एक है—मनुष्य की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, उसकी उपासना पद्धति और ईश्वर के प्रति उसका आंतरिक संबंध। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर को एक समान दृष्टि से नहीं देखता। कोई मूर्ति, मंत्र और पूजा-पाठ के माध्यम से ईश्वर को अनुभव करता है, कोई ध्यान और ज्ञान के द्वारा, कोई सेवा के द्वारा और कोई शक्ति या तांत्रिक साधना के माध्यम से।

ज्योतिष में नवम भाव धर्म का, पंचम भाव मंत्र और पूर्व जन्म के संस्कारों का, द्वादश भाव मोक्ष का तथा दशम भाव कर्म का प्रतिनिधित्व करता है। विशेष रूप से दशम भाव केवल जीविका का ही नहीं, बल्कि उस कर्म का भी द्योतक है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने धर्म और उपासना को अभिव्यक्त करता है। इस कारण अनेक प्राचीन ज्योतिषीय मतों में उपासना की प्रवृत्ति जानने के लिए दशम भाव और दशमेश का विशेष विचार किया गया है।

गुरु, बुध और मंगल का योग

जब गुरु, बुध और मंगल एक साथ हों तो व्यक्ति केवल धार्मिक नहीं होता, बल्कि धर्म को कर्म में उतारने वाला होता है। गुरु श्रद्धा और आध्यात्मिक ज्ञान देता है, बुध शास्त्र की समझ और तर्क प्रदान करता है तथा मंगल संकल्प और क्रियाशीलता देता है। ऐसा व्यक्ति केवल विचारों में नहीं रहता, बल्कि मंदिर निर्माण, पूजा आयोजन, यज्ञ, अनुष्ठान या धार्मिक कार्यों में सक्रिय भाग लेता है। उसकी उपासना सामान्यतः साकार ब्रह्म की ओर होती है, क्योंकि मंगल और बुध उसे किसी ठोस प्रतीक, देवता या मूर्ति के माध्यम से साधना करने की प्रेरणा देते हैं।

दशम भाव में गुरु और बुध

यदि दशम भाव में गुरु और बुध का योग हो तो व्यक्ति सात्त्विक प्रकृति का उपासक बनता है। ऐसे जातक की रुचि शास्त्राध्ययन, सत्संग, कथा, प्रवचन, जप और नियमित पूजा में होती है। वह धर्म को अंधविश्वास नहीं मानता, बल्कि उसे समझकर अपनाने का प्रयास करता है। उसकी श्रद्धा विवेकपूर्ण होती है। ऐसे लोग प्रायः किसी आराध्य देव के प्रति समर्पित होते हैं और जीवन में धार्मिक अनुशासन बनाए रखते हैं।

दशमेश शुभ होकर चन्द्रमा से युक्त हो

चन्द्रमा मन और भावना का कारक है। यदि दशमेश कोई शुभ ग्रह होकर चन्द्रमा से युक्त हो तथा राहु-केतु से पीड़ित न हो तो व्यक्ति का मन सहज रूप से भक्ति की ओर झुकता है। उसकी उपासना केवल बाहरी कर्मकांड नहीं होती, बल्कि उसमें भावनात्मक समर्पण भी होता है। ऐसे लोग भजन, कीर्तन, व्रत, तीर्थ और पूजा में गहरी रुचि रखते हैं।

बुध और दशमेश का नवम भाव से संबंध

यदि बुध उच्च का हो अथवा धर्मभाव से संबंधित हो तथा दशमेश नवम भाव में स्थित हो और राहु-केतु का प्रभाव न हो तो व्यक्ति धर्म को ज्ञान और विवेक के साथ ग्रहण करता है। उसकी भक्ति अंधानुकरण नहीं होती। वह शास्त्रों को पढ़ता है, प्रश्न पूछता है और समझकर साधना करता है। ऐसे लोग अक्सर धर्मग्रंथों के अध्ययन और शिक्षण में भी रुचि रखते हैं।

उच्च दशमेश और बुध का योग

जब दशमेश उच्च स्थिति में हो और बुध से युक्त हो, अथवा लग्नेश दशम भाव में तथा दशमेश नवम भाव में हो, तब व्यक्ति के जीवन में धर्म और कर्म का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। वह केवल व्यक्तिगत उपासना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज में भी धार्मिक और नैतिक मूल्यों का प्रसार करता है। यदि पापग्रहों की बाधा न हो तो ऐसा व्यक्ति आदर्श साकार उपासक बन सकता है।

बलवान दशमेश

यदि दशमेश दशम भाव में स्थित हो, शुभ वर्गों में हो अथवा केंद्र और त्रिकोण में स्थित हो, तो उपासना व्यक्ति के जीवन का स्थायी अंग बन जाती है। यहाँ उपासना केवल किसी संकट के समय की जाने वाली क्रिया नहीं होती, बल्कि जीवन की नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनती है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में भी योगदान देता है।

दशमेश बुध और बलवान गुरु

जब दशमेश बुध हो और गुरु बलवान हो तो ज्ञान और श्रद्धा का उत्कृष्ट समन्वय बनता है। ऐसा व्यक्ति मंत्र, वेद, ज्योतिष, दर्शन या धर्मशास्त्र के अध्ययन में रुचि ले सकता है। यदि चन्द्रमा तृतीय भाव में हो तो व्यक्ति स्वयं प्रयास करके साधना करता है। वह किसी प्रेरणा की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि नियमित जप, पाठ या ध्यान को अपने जीवन का अंग बना लेता है।

लग्नेश और दशमेश का संबंध

लग्न व्यक्ति का स्वभाव है और दशमेश उसका कर्म। जब दोनों में संबंध बनता है, विशेषतः जब दोनों का स्वामी एक ही ग्रह हो, तब व्यक्ति का स्वभाव और उसका कर्म एक दिशा में कार्य करते हैं। ऐसे लोग दिखावे की भक्ति नहीं करते। जो मानते हैं, उसी के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करते हैं। इसलिए उन्हें सफल सगुणोपासक कहा गया है।

दशमेश का शनि या राहु से संबंध

यदि दशमेश शनि या राहु से युक्त हो तो उपासना की प्रकृति बदल जाती है। यहाँ भक्ति में सात्त्विकता की अपेक्षा तप, कठोरता, रहस्यवाद या शक्ति-साधना का तत्व अधिक हो सकता है। शनि व्यक्ति को कठोर अनुशासन, एकांत और तपस्या की ओर ले जाता है, जबकि राहु उसे गूढ़, तांत्रिक अथवा अपरंपरागत साधनाओं की ओर आकर्षित कर सकता है। प्राचीन ग्रंथों ने इसे तामसी प्रवृत्ति कहा है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अधार्मिक होगा; बल्कि उसकी साधना की दिशा सामान्य वैदिक पूजा-पद्धति से भिन्न हो सकती है।

दशमेश सूर्य, शुक्र या चन्द्रमा हो

जब दशमेश सूर्य, शुक्र या चन्द्रमा हो तो व्यक्ति अकेले साधक की अपेक्षा सामूहिक धार्मिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय होता है। सूर्य उसे नेतृत्व देता है, शुक्र आयोजन और सौंदर्य का भाव देता है तथा चन्द्रमा जनसंपर्क और भावनात्मक जुड़ाव देता है। ऐसे लोग मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं, भंडारों, यज्ञों, उत्सवों और सामाजिक धार्मिक कार्यों के आयोजन में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। उनकी उपासना व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ लोककल्याण से भी जुड़ी होती है।

अंततः 

इन सभी योगों का मूल सिद्धांत यह है कि मनुष्य की उपासना केवल उसके वर्तमान जीवन की पसंद नहीं होती, बल्कि पूर्वजन्म के संस्कार, मानसिक प्रवृत्ति, कर्म और ग्रहस्थितियों का संयुक्त परिणाम होती है। गुरु श्रद्धा देता है, बुध समझ देता है, चन्द्रमा भाव देता है, मंगल संकल्प देता है, शनि तप देता है और राहु रहस्य की खोज देता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति की साधना-पद्धति भिन्न होती है।

ज्योतिष का उद्देश्य यह नहीं कि किसी उपासना को श्रेष्ठ और किसी को हीन सिद्ध किया जाए, बल्कि यह समझना है कि किस व्यक्ति का मन किस मार्ग से ईश्वर की ओर सहजता से अग्रसर होगा। जिस साधना में मन, बुद्धि और कर्म तीनों का समन्वय हो जाए, वही उस जातक के लिए सबसे उपयुक्त उपासना बन जाती है।
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" नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम् "

         🛟॥ श्री हरिः ॐ ॥☀️

    
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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹।      💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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🙏हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱🌿
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