*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक 1 दिसंबर 2025 *
*🎈 दिन - सोमवार
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शरद*
*🎈 मास - मार्गशीर्ष*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈तिथि- एकादशी 19:00:34*am तत्पश्चात् द्वादशी*
*🎈 नक्षत्र - रेवती 23:17:27* pmतत्पश्चात् अश्विनी*
*🎈 योग - व्यतिपत 24:57:58*am तक तत्पश्चात् वरियान*
*🎈करण - वणिज 08:19:34am तत्पश्चात् विष्टि भद्र,बव"
*🎈 पंचक 5 अहोरात्र-अशुभ*
*🎈 राहुकाल -हर जगह का अलग है- 08:28am to 09:28pm तक (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈चन्द्र राशि- मीन till 23:17:27
*🎈चन्द्र राशि - मेष from 23:17:27*
*🎈सूर्य राशि- वृश्चिक*
*🎈सूर्योदय - 07:08:47am*
*🎈सूर्यास्त -17:39:25pm*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल - पूर्व दिशा में*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 05:20 ए एम से 06:14:00( ए एम प्रातः तक *(नागौर
राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:45 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 11:57 पी एम से 12:51 ए एम, नवम्बर०१*
*🎈अमृतसिद्धि योग -09:05 ए एम से 010:34 ए एम, *
*🎈 व्रत एवं पर्व- एकादशी व्रत सोमवार*
*🎈विशेष - मार्गशीर्ष महात्म्य*
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*🛟चोघडिया, दिन🛟*
नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।
*🛟चोघडिया, रात्🛟*
🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
🌷 ..# 💐🍁🍁✍️ | #🌕 👉 👇🏼.......❗️
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👉 🍁 👉♦️ ⭐ आज मोक्षदा एकादशी व श्रीमद् भगवद्गीता की प्रतीकात्मक जयंती के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवद्गीता के दर्शन मात्र का बड़ा लाभ होता है। यदि इस दिन गीता के श्लोकों का वाचन किया जाए तो मनुष्य के पूर्व जन्म के दोषों का नाश होता है।पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 1 ,दिसंबर को है। एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध शुरू होने से पहले योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने 18 अक्षौहिणी सेना के बीच मोह में फंसे और कर्म से विमुख अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहते हैं। चूंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, अत: इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता पड़ा। भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं- अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या। माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है।
मोक्षदा एकादशी सोमवार 01, दिसम्बर 2025
2,दिसम्बर को, पारण व्रत तोड़ने का समय - 06:35 से 08:46
एकादशी तिथि प्रारम्भ - 30, नवम्बर 2025 को 21:29 बजे
एकादशी तिथि समाप्त - 01, दिसम्बर 2025 को 19:01 बजे
मोक्षदा एकादशी इसी दिन 'गीता जयन्ती' भी मनाई जाती है तथा इसी दिन भगवान कृष्ण ने मोहित हुए अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इस दिन गीता, श्रीकृष्ण, व्यास जी आदि का विधिपूर्वक पूजन करके गीता जयन्ती का उत्सव मनाया जाता है।
भगवान दामोदर की धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण को भोजन कराकर दानादि देने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन व्रत करने से दुर्लभ मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।
हिन्दू धर्म में मोक्ष को मनुष्य जीवन का लक्ष्य माना जाता है आत्मा कर्म अनुसार मनुष्य जीवन पाती है इसका मुख्य उद्देश्य सत्कर्म कर मोक्ष की प्राप्ति है इसलिए मानव जीवन को अन्य योनियों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि मोक्ष प्राप्त किए बिना मनुष्य को बार-बार इस संसार में आना पड़ता है। पद्म पुराण में मोक्ष की चाह रखने वाले प्राणियों के लिए "मोक्षदा एकादशी व्रत" रखने की सलाह दी गई है।
इस व्रत का उद्देश्य पितरो को मुक्ति दिलाना भी हैं। इससे मनुष्य के पूर्वजो को मोक्ष मिलता हैं। उनके कर्मो एवम बंधनों से उन्हें मुक्ति मिलती हैं। श्रीहरि के प्रताप से मनुष्य के पापो का नाश होता हैं और मनुष्य के मृत्यु के बाद उसका उद्धार होता हैं।
मोक्षदा एकादशी के दिन अन्य एकादशियों की तरह ही व्रत करने का विधान है। मोक्षदा एकादशी से एक दिन पहले यानि दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए तथा सोने से पहले भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए।
मोक्षदा एकादशी के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर पूरे घर में गंगाजल छिड़क कर घर को पवित्र करना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पूजा में तुलसी के पत्तों को अवश्य शामिल करना चाहिए।
पूजा करने बाद विष्णु के अवतारों की कथा का पाठ करना चाहिए। मोक्षदा एकादशी की रात्रि को भगवान श्रीहरि का भजन- कीर्तन करना चाहिए। द्वादशी के दिन पुन: विष्णु की पूजा कर ब्राह्मणों को भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। अंत: में परिवार के साथ बैठकर उपवास खोलना चाहिए।
मोक्ष की प्राप्ति के इच्छुक जातकों के लिए हिन्दू धर्म में इस व्रत को सबसे अहम और पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य से मनुष्य के समस्त पाप धुल जाते हैं और उसे जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है।
मोक्षदा एकदशी बहुत ही विशेष एकदशी है। यही वह शुभ दिन था जिस दिन भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को श्रीमद् भगवद गीता सुनाई थी।
जो कोई भी इस दिन किसी योग्य व्यक्ति को भगवत गीता उपहार के स्वरुप में देता है, वह श्री कृष्ण द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करता है।
पराना का मतलब व्रत खोलना होता है। एकदशी पराना एकदशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। द्विद्वादशी तिथि के भीतर ही पराना करना आवश्यक है। द्वादशी के भीतर पराना नहीं करना अपराध के समान है।
पराना को हरि वासर के दौरान नहीं करना चाहिए। हरि वासर के समाप्त होने के बाद ही व्रत को खोलना चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की एक चौथाई अवधि के बराबर है। उपवास तोड़ने का सबसे पसंदीदा समय प्रातःकाल है। मध्याह्न के दौरान व्रत को नहीं खोलना चाहिए। यदि कुछ कारणों से प्रातःकाल के दौरान उपवास ना खोल सके तोह व्रत मध्याह्न के बाद ही खोलना चाहिए।
कभी-कभी एकदशी का उपवास लगातार दो दिनों तक चलता है। यह सलाह दी जाती है कि पारिवारिक लोग केवल पहले दिन उपवास का पालन करें। दुसरे दिन की एकादशी बैरागी, विधवाओ के लिए है।
दोनों दिनों पर एकदशी का उपवास कट्टर श्रद्धालुओं के लिए है जो भगवान विष्णु के प्यार और स्नेह के इक्छुक हैं।
मोक्षदा एकादशी पौराणिक कथा
मोक्षदा एकादशी की पौराणिक कथा कुछ इस प्रकार है। एक समय की बात है गोकुल नगर पर वैखानस नाम के राजा राज किया करते थे। ये बहुत ही धार्मिक प्रकृति के राजा थे। प्रजा भी सुखचैन से अपने दिन बिता रही थी। राज्य में किसी भी तरह का कोई संकट नहीं था। एक दिन क्या हुआ कि राजा वैखानस अपने शयनकक्ष में आराम फरमा रहे थे। तभी क्या हुआ कि उन्होंने एक विचित्र स्वपन देखा जिसमें वे देख रहे हैं कि उनके पिता (जो मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे) नरक में बहुत कष्टों को झेल रहे हैं। अपने पिता को इन कष्टों में देखकर राजा बेचैन हो गये और उनकी निंद्रा भंग हो गई। अपने स्वपन के बारे में रात भर राजा विचार करते रहे लेकिन कुछ समझ नहीं आया। तब उन्होंनें प्रात:काल ही ब्राह्मणों को बुलवा भेजा। ब्राह्मणों के आने पर राजा ने उन्हें अपने स्वपन से अवगत करवाया। ब्राह्मणों को राजा के स्वपन से यह तो आभास हुआ कि उनके पिता को मृत्युपर्यन्त कष्ट झेलने पड़ रहे हैं लेकिन इनसे वे कैसे मुक्त हो सकते हैं इस बारे में कोई उपाय सुझाने में अपनी असमर्थता जताई। उन्होंनें राजा वैसानख को सुझाव दिया। आपकी इस शंका का समाधन पर्वत नामक मुनि कर सकते हैं। वे बहुत पंहुचे हुए मुनि हैं। अत: आप अतिशीघ्र उनके पास जाकर इसका उद्धार पूछें। अब राजा वैसानख ने वैसा ही किया और अपनी शंका को लेकर पर्वत मुनि के आश्रम में पंहुच गये। मुनि ने राजा के स्वपन की बात सुनी तो वे भी एक बार तो अनिष्ट के डर से चिंतित हुए। फिर उन्होंने अपनी योग दृष्टि से राजा के पिता को देखा। वे सचमुच नरक में पीड़ाओं को झेल रहे थे। उन्हें इसका कारण भी भान हो गया। तब उन्होंनें राजा से कहा कि हे राजन आपके पिता को अपने पूर्वजन्म पापकर्मों की सजा काटनी पड़ रही है। उन्होंने सौतेली स्त्री के वश में होकर दूसरी स्त्री को सम्मान नहीं दिया, उन्होंनें रतिदान का निषेध किया था। तब राजा ने उनसे पूछा हे मुनिवर मेरे पिता को इससे छुटकारा कैसे मिल सकता है। तब पर्वत मुनि ने उनसे कहा कि राजन यदि आप मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का विधिनुसार व्रत करें और उसके पुण्य को अपने पिता को दान कर दें तो उन्हें मोक्ष मिल सकता है। राजा ने ऐसा ही किया। विधिपूर्वक मार्गशीर्ष एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य को अपने पिता को दान करते ही आकाश से मंगल गान होने लगा। राजा ने प्रत्यक्ष देखा कि उसके पिता बैकुंठ में जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हे पुत्र मैं कुछ समय स्वर्ग का सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त हो जाऊंगा। यह सब तुम्हारे उपवास से संभव हुआ, तुमने नारकीय जीवन से मुझे छुटाकर सच्चे अर्थों में पुत्र होने का धर्म निभाया है। तुम्हारा कल्याण हो पुत्र।
राजा द्वारा एकादशी का व्रत रखने से उसके पिता के पापों का क्षय हुआ और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई इसी कारण इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा गया। चूंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश भी दिया था इसलिये यह
भगवान जगदीश्वर जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
💐 * #क्या महाराज दशरथ यह चाहते थे कि श्री राम वन को जायं ? (अंक -१)💐
क्या महाराज दशरथ यह चाहते थे कि श्री राम वन को जायं ? (अंक -१)
आइए ! श्रीराम भक्त तुलसीदासकृत रामचरितमानस के आधार पर इस प्रसंग का विश्लेषण करते हैं।
हम सभी जानते हैं कि रानी कैकेयी ने अपने स्वामी महाराज दशरथ जी से दो वर मांगे थे।
पहला - अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक तथा
दूसरा - श्री राम को 14 वर्ष का वनवास।
कैकेयी द्वारा यह सुनकर महाराज दशरथ की क्या हुई थी ? इस पर तुलसीदास जी लिखते हैं -
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा।
जनु सचान बन झपटेउ लावा।।
राजा सहम गए , उनसे कुछ कहते नहीं बना , मानो बाज जंगल में बटेर पर झपट पड़ा हो।
कुछ देर पश्चात् धीरज रखकर महाराज दशरथ रानी कैकयी से कहते हैं -
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई।
देउं भरत कहुं राज बजाई।।
शुभ मुहूर्त देखकर सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरत को राज्य दे दूंगा।
एकहि बात मोहि दुखु लागा।
बर दूसर असमंजस मांगा।।
एक ही बात का मुझे दुःख हुआ कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का (असहज) मांगा।
राजा दशरथ रानी कैकई को समझाते हुए कहते हैं -
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचार बिबेक।
हे प्रिये ! हंसी और क्रोध छोड़कर विवेकानुसार (उचित-अनुचित का विचार कर) वर मांगो।
इसका अर्थ यह हुआ कि राजा दशरथ कैकेयी को " राम के वनगमन " को छोड़कर दूसरा वर मांगने को कहते हैं।
राजा दशरथ की विनती सुनकर कैकेयी क्रोधित होकर चेतावनी दे देती है -
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।
सबेरा होते ही मुनि का वेश धारण कर यदि राम वन को नहीं जाते हैं , तो हे राजन ! मन में (निश्चित) समझ लीजिए कि मेरी मृत्यु होगी और आपका अपयश होगा।
चिंतामग्न हो राजा दशरथ पूरी रात जागकर ही बिताते हैं। सुबह जब श्री राम अपने पिता महाराज दशरथ से मिलने आते हैं , तब
सोक बिबस कछु कहै न पारा।
हृदयं लगावत बारहिं बारा।
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं।
जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
शोक के विशेष वश होने के कारण राजा कुछ कह नहीं पा रहे हैं। वे बार-बार श्री राम को हृदय से लगाते हैं और मन में ब्रह्मा जी को मनाते हैं कि जिससे राम जंगल को न जायं।
यहां तक कि महाराज दशरथ महादेव शंकर जी से भी विनती करते हुए कहते हैं -
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी।
बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयं सो मति रामहि देहु।
बचन मोरि तजि रहहिं घर परिहर सीलु स्नेहु।।
हे सदाशिव! आप प्रेरकरूप से सब के हृदय में हैं। आप श्री राम को ऐसी बुद्धि दीजिए , जिससे वह मेरे वचन को त्याग कर और शील-स्नेह को छोड़कर घर में ही रह जाय।
इससे पता चलता है कि कैकेयी द्वारा राम के वनवास का वर मांगने के बाद भी महाराज दशरथ कभी यह नहीं चाहते थे कि श्री राम वनगमन करें।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।
💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी संबद्ध विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेवें...*
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱









