*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक -15 मार्च 2026*
*🎈 वार- रविवार*
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈 मास - चैत्र मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष,*
*🎈तिथि- एकादशी 09:15:53* तत्पश्चात् द्वादशी *
*🎈 नक्षत्र - श्रवण 29:55:14* तक तत्पश्चात् धनिष्ठा 👇
*🎈 योग - परिघ 10:24:22* तक तत्पश्चात् शिव *
*🎈करण - बालव 09:15:53* तक तत्पश्चात् कोलव*
*🎈राहुकाल -09:45 pm से 11:15pm(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
*🎈 चन्द्र राशि- मकर*
*🎈सूर्य राशि- मीन*
*🎈 सूर्योदय - 06:45:59*
*🎈सूर्यास्त - 18:42:18*pm*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 05:09 ए एम से 05:57 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:20 पी एम से 01:08 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:20 ए एम, मार्च 16 से 01:08 ए एम, मार्च 16*
*🎈 अमृत काल -07:03 पी एम से 08:43 पी एम*
*🎈 द्विपुष्कर योग -05:56 ए एम, मार्च 16 से 06:44 ए एम, मार्च 16*
*🎈 व्रत एवं पर्व द्वादशी व्रत
सोमवार को*
*🎈विशेष चैत्र मास महात्म्य *
🙏 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🙏
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*🛟चोघडिया, दिन का🛟*
नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।*
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*🛟चोघडिया, रात्🛟*
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🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
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🔱 दशामाता : दो हजार वर्षों के साक्ष्य
• श्रीकृष्ण "जुगनू"
होलिका दहन से लेकर दस दिन तक लोककथाओं के कथन और वार्ता के श्रवण की परम्परा में हमारे सामाजिक संबंध के सूत्र और वे मूल्य जुड़े होते हैं जो भारतीय परिवारों की मूल विशेषता है। यह विशेषता सामूहिक संबद्धता का पोषण करने वाली है।
दशामाता की व्रत कथाओं में अपेक्षाकृत पुरानी नल दमयंती की कथा है जो महाभारत में लोक से लेकर लिखी गई लेकिन लोककण्ठ ने उसे सदा आदरणीय मानकर सम्मान दिया। सास ने बहू को, बहू ने अपनी बहू को और बहू ने अपनी बहू को सुनाई... याद नहीं रही तो किसी बात कहने वाली स्त्री के पास जाकर सुनी और जिसको याद है, उसने दसों ही दिन बोलकर दोहराई। कोई सुनने वाली नहीं मिली तो हथेली में अन्न के आखा लेकर अथवा जल भरे लोटे के आगे सुनाई। लेकिन, सुनाई ही!
सत्य कथन, सबका सम्मान, सहचर का निश्छल साथ, सच्चा संबंध, समभाव, सहिष्णुता, सतीत्व, साझेदारी का महत्व, सहजता और सदाचरण - ये दस मानवता के शाश्वत मूल्य हैं। मानवता के निर्धारक होने से ये मातृरूप हैं। इनका जीवन में पालन करना ही पूजन है। दशामाता की कथाओं में ये भाव अंतर्निहित है। इनके व्रत पालन से ही दमयंती महारानी होती है और नल महाराजा! सदा सुदशा, सुख, सौभाग्य के लिए यह जीवन मंत्र है। ( राजस्थान की लोक व्रत संस्कृति : डॉ. कविता मेहता)
नैषध परिशीलन से ज्ञात होता है कि नल- कथा अति प्राचीन काल से प्रसिद्ध रही है। रामायण एवं महाभारत में उसका उल्लेख देखकर उसकी वैदिक साहित्य में प्रसिद्धि का भी अनुमान लगाया जा सकता है। वाल्मीकि रामायण में रावण के लिए सीता को डरानेवाली राक्ष- सियों को सीता ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा था- "दीन हो या राज्यहीन हो जो मेरा पति है वही मेरा गुरु है । उसमें मैं उसी प्रकार अनुरक्त हूँ जैसे सूर्य में सुवर्चला। भीम कुमारी दमयन्ती जैसे अपने पति नैषध (नल) में अनुरक्त थी उसी प्रकार मैं अपने पति इक्ष्वाकुवंश - शिरोमणि राम में अनुरक्त हूँ ।" ऐसे ही 'महाभारत' में तो नल कथा पूर्ण विस्तार के साथ कही गई है। 'नैषधीयचरित' का वही आधार ही है ।
पुराणों में भी इसका उल्लेख हुआ है। उनमें यद्यपि महाभारत की भाँति विस्तृत रूप से वर्णित नहीं है, किन्तु उससे उसकी लोकख्याति का पता तो चल ही जाता है। मत्स्यपुराण में इक्ष्वाकु वंश वर्णन के प्रसंग में वीरसेन के पुत्र नल तथा निषध के पुत्र नल का उल्लेख किया गया है। पंचतंत्र में विष्णु शर्मा नल के राज्य चले जाने और दरबदर भटकने का स्मरण करना नहीं भूले और कहा कि समय कैसी दशा कर सकता है। काल का क्या कहना : प्रतिष्ठित मूर्तियां और स्थापित माहात्म्य तक व्यर्थ सिद्ध हो सकते हैं : नलस्य नृपते राज्यात् परिभ्रंशनम्।
खंडात्मक स्कन्दपुराण में नल का दो बार उल्लेख हुआ है। एक उस समय जब वन में दमयन्ती को अकेली त्यागकर दुःखी नल घूमते हुए हाटकेश्वरक्षेत्र पहुँचे और वहाँ उन्होंने चर्ममुण्डा देवी की स्थापना की और उसी के समीप में शिवलिंग की स्थापना की जो नलेश्वर नाम से विख्यात हुए।" दूसरे में केवल नलेश्वर के प्रसंग में नामोल्लेख मात्र हुआ है। कथा विस्तार के साथ नहीं कही गयी है। पहली बार भी प्रथम स्थल में नल का पूर्वार्द्ध जीवन केवल दो श्लोकों में कह दिया गया है : "पुराने समय में वीरसेन के पुत्र नल नाम के राजा हुए। वे सब गुणों से युक्त तथा शत्रुओं का विनाश करनेवाले थे। उनकी प्राणों से भी प्रिय भार्या दमयन्ती थी। वह विदर्भ राज की पुत्री थी।" उत्तरार्द्ध का कुछ विस्तार से वर्णन हुआ है क्योंकि वहाँ उसी से प्रयोजन था। लिंग-पुराण में सूर्यवंशीय राजा ऋतुपर्ण का वर्णन करते हुए उनके मित्र वीरसेन के पुत्र निषधाधिपति नल का उल्लेख हुआ है ।
पैशाची भाषा में लिखित गुणाढ्य की बृहत्कथा में भी नलकथा कही गयी थी। हालाँकि दुर्भाग्य से बृहत्कथा का मूल इस समय प्राप्य नहीं है, दूसरे क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी में और सोमदेव भट्ट की कथा सरित्सागर में जो गुणाढ्य की बृहत्कथा के संस्कृत रूपान्तर हैं, उनमें नल-कथा का वर्णन हम सहज को देखकर करते हैं।
स्कन्दपुराण 6वें नागरखण्ड (अध्याय 54, 55 2 व 7) और प्रभासखण्ड (अध्याय 345) में प्रसंग हैं।
यथा :
वीरसेनसुतः पूर्व नलो नाम महीपतिः।
आसीत्सर्वगुणोपेतः सर्वशत्रुक्षयवः।।
भार्यात्स्याभवत्साध्वी प्राणेभ्योऽपिगरियसि।
दमयन्तिति मृगमा विदर्भाधिपतेः सुता।
( स्कंद पुराण खंड 6, अध्याय 54-3, 4)
पोऽयुतायुषो धीमन् ऋतुपर्णी महायशाः।
व्याक्षहृदयज्ञो वै राजा नलसखो बली।।
नालोद्वैव भगवानौ पुराणेषु दृढव्रतौ।
वीरसेनसुतश्चान्यो यश्चक्ष्वाकुकुलोद्भवः।। (66, 23-25)
इनके अतिरिक्त, अन्य पुराणों में भी नल नाम का उल्लेख हुआ है। कहीं नैयध नल का, कहीं सूर्यवंशीय नल का और कहीं किसी अन्य नल का। उनमें निषेधराज नल की कथा का यद्यपि कोई संकेत नहीं किन्तु नल नाम की प्राचीनता तो सिद्ध ही हो जाती है ।
कूर्मपुराण में सूर्यवंशीय 'नल' का उल्लेख हुआ है—
अतिथिस्तु कुशज्जज्ञे निष्वस्तत्सुतोऽभवत्।
नलश्च निषधस्यासीत् नभास्तस्मादजायत।।
भविष्य पुराण में आशामाता के नाम से इस व्रत को दिया गया है। आशा संख्यावाची शब्द है जिसका आशय दिशा है और दिशाएं 10 होती हैं। इस तरह यह व्रत दस दिन वाला है। दस तिथि वाला है। बीच में जिस दिन रविवार पड़ जाए उस दिन दाड़ा बावजी (सूर्यदेव) के नाम व्रत रखकर एक ही रोट को दही, गुड़ घी के साथ (अलुना) खाया जाता है लेकिन उससे पहले रोट में छेदकर चुपचाप भानुदर्शन किया जाता है। किसी मनुष्य का चेहरा नहीं देखा जाता। यह उस काल की नारी स्मृति है जब कुन्ती जैसी कन्याएं प्रकाश जैसे तत्त्व के धारक को मोहवश खोह से देखती थी लेकिन अन्नचूर्ण के रोट उसी सूर्य के आकार के बनाकर चुपके से खाना सीखी थी...।
दशा व्रत दस बिंदी वाला है। मातृकाओं को बिंदी से ही जाना जाता है। कार्तिकेय ने उनके आधार पर ही 26 (+ 1) अक्षर सीखे। इसका अन्य कोई रूप नहीं। डोरक व्रत होने से इसको हमेशा याद रखा जाता है। डोरे पर दस गांठ होती है। व्रत में भित्ति पर दस गांठ की प्रतीक कुमकुम और काजल या मेंहदी से 10 - 10 बिंदी लगाई जाती है। पीपल का पूजन किया जाता है और परिक्रमा कर हल्दी मिले आटे के गहने निवेदित किए जाते हैं और घर के द्वार पर स्वास्तिक बनाकर एकाशन किया जाता है...। यह लोकभाषा के संरक्षण का सुंदर माध्यम भी है।
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वहां अनेक बरसों से ऐसे चित्रों के आगे कथा कथन, श्रवण होता है। धोयंदा, फरारा, बेडला आदि में भी कथा चौरों पर ऐसे अंकन मिलते हैं, इसमें ऊंट कहां से आ बैठे? चतुरों ने चलाए हैं! यह पोस्ट किसीलेखक से ली गई है।
#दशामाता #नल_दमयंती #दसामाता
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. 💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱🔥🔱





