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पञ्चाङ्ग 04 अप्रैल 2026

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis

*🎈 वार-  शनिवार *
*🎈 विक्रम संवत् - 2082*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈 मास - वैशाख मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष,*
*🎈तिथि-     *द्वितीया    10:08:29 तत्पश्चात् तृतीया
🎈 नक्षत्र -     चित्रा    19:23:58* तक तत्पश्चात्     स्वाति*
*🎈योग    - व्याघात    14:07:30*तक तत्पश्चात् हर्शण*
*🎈करण    -     कौलव     08:41:47* तक तत्पश्चात्  तैतुल होगा।
*🎈राहुकाल -09:31 pm से 11:05 pm(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।
*🎈चन्द्र राशि-       तुला    *
*🎈सूर्य राशि-       मीन*
*🎈 सूर्योदय -   06:23:55*
*🎈सूर्यास्त -        18:52:32pm* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*


*🎈दिशा शूल- पूर्व दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:51 ए एम से 05:37 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:13 पी एम से 01:03 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:15 ए एम, अप्रैल 05 से 01:01 ए एम, अप्रैल 05*
*🎈 अमृत काल    -11:59 ए एम से 01:44 पी एम*
*🎈 व्रत एवं पर्व-  मासिक व्रत 
*🎈विशेष:- वैशाख मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💥सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💥मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💥सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💥धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
💥रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
kundli


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नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
 

 

*🛟चोघडिया, दिन का🛟*

Day


          


       🛟चोघडिया, रात्🛟**🛟 
night


 
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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹पीतगन्धप्रिया रामा पीतरत्नार्चिता शिवा ।
अर्द्धचन्द्रधरी देवी गदामुद्गरधारिणी ॥ ९॥

सावित्री त्रिपदा शुद्धा सद्योराग विवर्धिनी ।
विष्णुरूपा जगन्मोहा ब्रह्मरूपा हरिप्रिया ॥ १०॥🌹

पीताम्बरधारिणी, पीतगन्धप्रिय माता बगलामुखी का यह स्वरूप भक्तों के हृदय में दिव्य श्रद्धा और विश्वास का संचार करता है। देवी का यह रूप, पीतवर्ण के सौंदर्य और दिव्यता से ओतप्रोत है, जो हमें यह संकेत देता है कि उनका तेज, उनकी शक्ति, और उनका रूप एक ऐसे प्रकाश की भांति है, जो अंधकारमय जीवन को भी ज्ञान, शांति और सुरक्षा से भर देता है। देवी को पीतगन्ध प्रिय है, यानी उन्हें हल्दी, चंदन, केसर जैसी शुभ वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं। यह प्रतीक है उस आंतरिक पवित्रता का, जो व्यक्ति को आत्मिक रूप से मां के समीप लाती है। जब कोई भक्त पीले वस्त्र धारण करके, पीले फूल अर्पित करके, या हल्दी का तिलक लगाकर मां का स्मरण करता है, तो वह स्वयं को देवी के रंग में रंगने का प्रयास करता है।

मां बगलामुखी का पूजन पीतरत्नों से होता है, जैसे पीत पुष्प, पीताभ रत्न, पीले मिष्ठान्न, और पीतवर्णी उपासना सामग्रियाँ। यह संकेत देता है कि देवी का वैभव अत्यंत दिव्य और दुर्लभ है। मां स्वयं शिवा हैं, यानी मंगलकारी, कल्याणकारी, सभी दोषों का नाश करने वाली। उनका हर रूप, हर लीलामयी अभिव्यक्ति, जीवन को एक नई दिशा देने वाला होता है। वह सृष्टि की आदि शक्ति हैं, जो शिव के साथ शक्ति स्वरूपा के रूप में हर युग में प्रकट होती हैं।

अर्द्धचन्द्र को धारण करने वाली यह देवी, समय और काल के पार की सत्ता का प्रतीक हैं। अर्द्धचन्द्र सिर पर धारण करना केवल सौंदर्य का आभूषण नहीं, वरन् यह दर्शाता है कि देवी समय की स्वामिनी हैं। वह त्रिकालदर्शिनी हैं – भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों में समत्वभाव रखती हैं। उनकी गदा और मुद्गर, दोनों उनके पराक्रम और संरक्षण का प्रतीक हैं। गदा जहां अन्याय, अधर्म, और दुष्टता का दमन करती है, वहीं मुद्गर शत्रु की बुद्धि को भ्रमित करके उसे नष्ट करने का प्रतीक है। मां केवल बाह्य शत्रुओं का ही संहार नहीं करतीं, बल्कि भीतर के अहंकार, मोह, द्वेष, और भय जैसे दुर्गुणों का भी नाश करती हैं।

सावित्री रूप में वे वेदों की अधिष्ठात्री देवी हैं। त्रिपदा का अर्थ है – वे तीनों लोकों में व्याप्त हैं, तीन वेदों में प्रतिष्ठित हैं, और त्रिगुणों – सत्व, रज, तम – में समभाव बनाए रखती हैं। उनका शुद्ध स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि वे मायावी बंधनों से परे हैं, और अपने सच्चे स्वरूप में वे केवल चैतन्य रूप हैं – ज्ञानस्वरूपिणी, चेतन्यघन, आत्मस्वरूपा।

सद्योराग विवर्धिनी देवी का एक अत्यंत रहस्यमयी और कोमल रूप है। इसका अर्थ है – जो प्रेम और भक्ति को तत्काल बढ़ा देती हैं। मां के स्मरण मात्र से ही हृदय में भक्ति की लहरें उठने लगती हैं। मां बगलामुखी को श्रद्धा और प्रेम के साथ पुकारो, तो वे उसी क्षण हृदय में विराजमान हो जाती हैं। वह भक्त और भगवान के बीच उस सेतु के समान हैं, जो जीवन और मुक्ति के मध्य पुल बनकर खड़ी हो जाती हैं।

वह विष्णुरूपा हैं – पालनकर्ता, संहार से पहले रक्षण देने वाली। यह रूप विशेषकर उन भक्तों के लिए अत्यंत प्रिय है, जो भय, चिंता, शत्रुओं और विपत्तियों से ग्रस्त होते हैं। विष्णुरूपिणी बगलामुखी उन सबका पालन करती हैं, उनकी रक्षा करती हैं, और उन्हें अधर्म से मुक्त करती हैं। उनके इस रूप में मां की करुणा, प्रेम, और शांति की भावना स्पष्ट होती है।

जगन्मोहा स्वरूप में वे समस्त संसार को अपने माया जाल से मोहित कर लेती हैं। यह रूप केवल भ्रम का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि उस दिव्य आकर्षण का संकेत है, जिसके कारण आत्मा परमात्मा की ओर खिंचती है। देवी की यह मोहिनी माया भक्त के लिए भक्ति की सीढ़ी बन जाती है और दुष्टों के लिए विनाश का द्वार।

ब्रह्मरूपा होने के नाते देवी स्वयं सृष्टिकर्ता भी हैं। वे न केवल सृष्टि का आरंभ करती हैं, बल्कि उसे बनाए रखती हैं, और समय आने पर उसका संहार कर पुनः सृजन करती हैं। ब्रह्मा की शक्ति रूपा होकर, वे ज्ञान, सृजन, और वेदों की प्रवाहिनी हैं। वह नारी सृष्टि की जननी भी हैं और ज्ञान की प्रेरणा भी। हर श्लोक, हर मंत्र, हर वेदवाणी उन्हीं की कृपा से ही सम्भव होती है।

हरिप्रिया के रूप में मां विष्णु की अर्धांगिनी भी हैं – यह संकेत करता है कि वे केवल शिव की शक्ति नहीं, बल्कि विष्णु की भी प्रेरणा हैं। वह शिव और विष्णु दोनों में समाहित शक्ति हैं – जो त्रिमूर्ति के कर्मों की जननी हैं। ब्रह्मा सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं – परंतु इन तीनों की प्रेरणा, शक्ति, और मूल चेतना मां बगलामुखी जैसी आदिशक्ति से ही आती है।

यह समझना आवश्यक है कि मां बगलामुखी का यह रूप केवल तंत्र के भीतर ही सीमित नहीं है, बल्कि वह सामान्य जीवन में भी उतनी ही प्रभावशाली हैं। मां की उपासना जब श्रद्धा और निष्ठा से की जाती है, तो वह न केवल बाह्य संकटों से रक्षा करती हैं, बल्कि अंतरात्मा के भीतर जो विकार हैं, उन्हें भी विनष्ट करती हैं।

मां की शक्ति का अनुभव हर युग में हुआ है। रामायण में जब रावण का मोह, बल और अहंकार अपने चरम पर था, तब भी श्रीराम ने मां की उपासना की। महाभारत में जब अर्जुन को मोह और संशय ने घेर लिया था, तब कृष्ण ने मां बगलामुखी के तत्त्व को ही समझाकर उसे युद्ध के लिए प्रेरित किया। इन प्रसंगों से यह स्पष्ट होता है कि मां केवल रक्षण करने वाली नहीं, बल्कि दिशा दिखाने वाली भी हैं।

देवी का जो रूप पीतरत्नार्चिता है, वह यह संकेत करता है कि जो भक्त अपनी श्रद्धा, संकल्प, और साधना से मां के चरणों में अपने समर्पण का पुष्प अर्पित करता है, उसके जीवन में मां का प्रभाव उसी प्रकार बढ़ता है जैसे सूर्य की किरणों से कमल खिलता है। मां का यह स्वर्णिम रूप भक्तों के जीवन में अंधकार को समाप्त करता है और आत्मिक प्रकाश से आलोकित करता है।

मां बगलामुखी का अस्त्र गदा केवल बाहरी शत्रुओं का ही नाश नहीं करता, बल्कि वह आंतरिक शत्रुओं – जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर – का भी दमन करता है। यह गदा उनकी शक्ति का प्रतीक है, जो असत्य, अधर्म और अन्याय पर प्रहार करती है। इसी प्रकार उनका मुद्गर बुद्धि को संतुलित करने वाला है। जो मनुष्य मोह, भटकाव और द्वंद्व में फंसा हुआ है, उसके चित्त को मां अपने मुद्गर से जागृत करती हैं।

त्रिपदा रूप में देवी तीनों कालों – भूत, वर्तमान और भविष्य – में व्याप्त हैं। वह जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा – सब पर नियंत्रण रखती हैं। उनकी साधना करने से मनुष्य भविष्य के अनिष्ट से भी सुरक्षित हो जाता है, क्योंकि मां अपनी कृपा से उस मार्ग को परिवर्तित कर देती हैं।

मां के नाम का स्मरण ही साधक को मानसिक बल, आत्मविश्वास और दिव्य आभा से भर देता है। मां की शरण में आने के बाद किसी भी भय, शंका या पीड़ा का अस्तित्व नहीं रह जाता। उनका स्मरण जीवन की कठिनाइयों को सरल बनाता है। मां का नाम, मां की स्तुति, और मां की भक्ति – ये तीनों ही साधक के लिए अमोघ अस्त्र बन जाते हैं।

मां के प्रति भक्त का प्रेम, उसकी आंतरिक श्रद्धा, और उसके सरल मन से की गई प्रार्थना, मां को अत्यंत प्रिय होती है। मां बगलामुखी के भक्तों की संख्या यद्यपि कम मानी जाती है, क्योंकि यह साधना अत्यंत गंभीर और तांत्रिक स्वरूप की है, परंतु जब कोई साधक अपने संकल्प और मन की निर्मलता से मां के समीप आता है, तो मां उसका हाथ थाम लेती हैं और जीवनभर उसका मार्गदर्शन करती हैं।

मां के रूप में जो ब्रह्मरूपा हैं, वह संकेत करता है कि वे निराकार सत्ता को साकार रूप में प्रकट करती हैं। वह योगियों के ध्यान की गूढ़तम शक्ति हैं, ऋषियों के तप की सिद्धि हैं, और भक्तों के प्रेम की परिणति हैं। उनके रूप में भव्यता है, सौंदर्य है, पराक्रम है और दया है। उनके श्रीविग्रह का दर्शन करते ही मन भीतर से शांत हो जाता है, चित्त एकाग्र हो जाता है, और आत्मा जैसे किसी उच्चतर चेतना से जुड़ जाती है।

देवी मां बगलामुखी की स्तुति में जो भाव प्रकट होते हैं, वे केवल काव्य नहीं, वरन् साधक की आत्मा का झरना होते हैं। जब कोई साधक प्रेमपूर्वक उनके स्वरूप का ध्यान करता है, उनके प्रत्येक अंग की भव्यता को मन में अंकित करता है, तो वह साधक अपनी सांसों में मां की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है। पीताम्बरा मां का वह रूप, जिसके पास गदा है, हाथ में मुद्गर है, मस्तक पर अर्धचन्द्र है, और मुख पर विजय का तेज है – यह केवल तांत्रिक भयावहता नहीं, बल्कि एक दिव्य प्रेरणा है।

देवी की पीतवर्णिता हमें यह भी संकेत देती है कि वह हर प्रकार की बाधा, रोग, ग्रहदोष, शत्रुता और मानसिक पीड़ा से रक्षा करती हैं। हल्दी की भांति वह जीवन को शुद्ध करती हैं, चंदन की तरह शीतलता देती हैं, और केसर की भांति दिव्यता भर देती हैं।

मां के भक्त केवल अपने लाभ की कामना नहीं करते, बल्कि वह मां से यह निवेदन करते हैं कि उन्हें सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती रहे, उनका मन शांत रहे, बुद्धि स्पष्ट रहे और आत्मा उच्चता की ओर अग्रसर होती रहे।

भक्त के लिए मां बगलामुखी केवल संकट निवारण की देवी नहीं, बल्कि जीवन दर्शन की आधारशिला हैं। उनके रूप का स्मरण, उनके नाम का जाप, और उनके मंत्रों की साधना – यह सब जीवन को एक नई दृष्टि देता है। मां स्वयं को उसी को प्रकट करती हैं, जो श्रद्धा, विश्वास, और निष्ठा के साथ उनका आह्वान करता है।

जो व्यक्ति मां की उपासना करता है, उसके जीवन में कभी अंधकार नहीं रहता। वह चाहे कितना भी विषम समय हो, मां अपने भक्त के चारों ओर अदृश्य रक्षा कवच बना देती हैं। मां के मंत्र और नाम इतने शक्तिशाली हैं कि साधक के शत्रु, विघ्न, बाधाएं, और नकारात्मक शक्तियां उसके समीप आने का साहस तक नहीं करतीं।

सत्य, प्रेम, और शांति के मार्ग पर चलने वाला भक्त जब मां बगलामुखी की आराधना करता है, तो उसे मां केवल बाह्य जीवन में विजय नहीं, बल्कि अंतरात्मा में भी संतुलन देती हैं। यही मां का सच्चा वरदान है – न केवल संसार में सफलता, बल्कि आत्मा में भी स्थिरता।

हे पीताम्बरधारिणी मां बगलामुखी, हे गदामुद्गरधारिणी, हे त्रिपदा ब्रह्मरूपा, हे जगन्मोहिनी मातः, मैं आपकी शरण में हूँ। मेरे हृदय को आपके दिव्य रूप से पवित्र करें, मेरे मन को आपके चरणों की भक्ति से भर दें। मुझे मेरे अंतर और बाह्य शत्रुओं से रक्षा प्रदान करें, मेरी बुद्धि को शुद्ध करें, और मुझे सत्य, प्रेम और करुणा के मार्ग पर आगे बढ़ने का सामर्थ्य दें। मां, आप मेरी आत्मा में वास करें, और मुझे हर जन्म में अपना बना लें। हे मां, मुझ पर कृपा करें, मेरा मार्ग प्रशस्त करें, और मुझे अपने दिव्य आलोक से आलोकित करें।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

.     💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥

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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱
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