*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक 25 जून 2026*
*🎈 वार- गुरुवार*
*🎈 मास - ज्येष्ठ मास*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)- रौद्र*
*🎈 अयन - उत्तरायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि - निर्जला एकादशी 20:08:46*
*तत्पश्चात द्वादशी*
*🎈 नक्षत्र - स्वाति 16:28:19 तक* तत्पश्चात् विशाखा*
*🎈योग - शिव 10:52:37* तक तत्पश्चात् सिद्ध*
*🎈करण- विष्टि भद्र 20:08:46* तक तत्पश्चात् तैतुल*
*🎈राहुकाल -02:21pm से 04:05 pm (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)
*🎈चन्द्र राशि- तुला*
*🎈सूर्य राशि- मिथुन*
*🎈 सूर्योदय - 05:43:24*
*🎈 सूर्यास्त - 19:31:58*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- दक्षिण दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 12:18 ए एम, जून 26 से 12:58 ए एम, जून 26*
*🎈अभिजित मुहूर्त* 12:10 पी एम से 01:05 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:18 ए एम, जून 25 से 12:58 ए एम, जून 25*
*🎈 रवि योग- 05:42 ए एम से 04:29 पी एम*
*🎈 व्रत एवं पर्व विवरण. ब्रह्मवैवर्त पुराण (विशेषकर ब्रह्म खंड) के अनुसार तिथि को 'कलम्बी' नामक साग का सेवन निषेध माना गया है। इसके अतिरिक्त, यदि आप एकादशी व्रत का पालन कर रहे हैं, तो दशमी तिथि को लहसुन, प्याज, मसूर की दाल, शहद, गाजर और बासी भोजन नहीं करना चाहिए।
*🎈विशेष - दशमी व्रत*
*🎈विशेष:- जेष्ठ मास महात्म्य *
👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी 💢सेनाधिपति चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💢मन्त्री मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के 💢स्वामी धान्याधिपति बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💢सस्याधिपति गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी
🛟मेघाधिपति चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💢धनाधिपति गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी नीरसाधिपति
💢गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
🛟रसाधिपति शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी फलाधिपति
चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
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🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
*🛟चोघडिया, दिन का🛟*
🛟चोघडिया, रात्🛟*
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🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
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💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺
👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹।। 🔶🔶🌹🌹 🌹
➡️ *।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।
🌺🌷🏓।। जय श्री राम ।।
॥ 🌹🌹निर्जला एकादशी🌹
💕ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली निर्जला एकादशी का हिंदू धर्म में बहुत बड़ा महत्व है।
💥इस दिन बिना अन्न और जल (निर्जल) के उपवास रखा जाता है। मान्यता है कि यह व्रत रखने से वर्ष की सभी 24 एकादशियों के व्रत का फल और भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है。इसका मुख्य महत्व और पौराणिक कथा निम्नलिखित है:निर्जला एकादशी का महत्व (Mahatva)सभी एकादशियों के बराबर फल: पद्म पुराण के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पूरे साल की सभी एकादशियों के व्रत करने में असमर्थ है, तो वह केवल इस एक कठोर व्रत को करके पूरे वर्ष के उपवास का पुण्य प्राप्त कर सकता है。पापों का नाश: ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप धुल जाते हैं。मोक्ष की प्राप्ति: यह व्रत मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है और मृत्यु के पश्चात सीधे बैकुंठ धाम (भगवान विष्णु का लोक) की प्राप्ति होती है。पांडव भीमसेन से जुड़ी पौराणिक कथामहाभारत काल में पांचों पांडवों और द्रौपदी को हर एकादशी का व्रत करने की आज्ञा थी। लेकिन, भीमसेन (जिन्हें बहुत भूख लगती थी) इस नियम का पालन करने में असमर्थ थे।अपनी इस असमर्थता का उपाय जानने के लिए भीमसेन महर्षि वेद व्यास के पास गए。व्यासजी ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना जल और अन्न ग्रहण किए व्रत रहने की सलाह दी。भीमसेन ने इस कठोर व्रत को किया और इसी कारण इसे 'भीमसेनी एकादशी' या 'पांडव एकादशी' भी कहा जाता है。दान-पुण्य का महत्वनिर्जला एकादशी पर उपवास रखने के साथ-साथ दान का भी बहुत अधिक महत्व है। इस दिन जल, फल, वस्त्र, छाता, और अन्न का दान गरीबों या ब्राह्मणों को करना बहुत शुभ माना जाता है。इस व्रत का मूल नियम यह है कि इसे बिना पानी पिए पूरा करना होता है। पानी पीने से व्रत टूट जाता है और संभवतः निष्फल हो जाता है।निर्जला एकादशी रीति-रिवाज और परंपराएँ
💥निर्जला एकादशी रीति-रिवाज और परंपराएँ💥
💥एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें, धुले हुए वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु को दीप जलाकर, फूल, तुलसी, फल (पीले केले अधिमानतः) और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करके प्रार्थना करें। प्रार्थना के बाद कुछ मिनटों का ध्यान करें। यदि आसपास कोई विष्णु मंदिर हो, तो मंदिर जाकर पूजा और आरती में भाग लें। महिलाएं पूजा के बाद पीपल के पेड़ की जड़ों में जल अर्पित करें।
💥पूजा करने के बाद, सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक उपवास रखना चाहिए। इस दौरान कुछ भी खाना-पीना मना है। ऐसा करने पर आपका उपवास टूट जाएगा। ज्येष्ठ माह ग्रीष्म ऋतु के चरम पर पड़ता है, इसलिए पानी के बिना रहना मुश्किल होता है। इन दिनों प्यास बहुत तेज लगती है। केवल पूर्ण श्रद्धा से ही आप अपना उपवास पूरा कर पाएंगे। यही कारण है कि केवल सच्चे भक्त ही इसे रखते हैं।
💥दिन के समय, आपको विष्णु अष्टोत्रम/सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए या 'ॐ नमो नारायण' मंत्र का जाप करना चाहिए या भगवान विष्णु को समर्पित कोई अन्य प्रार्थना करनी चाहिए। दोपहर में, आपको फिर से स्नान करना चाहिए और भगवान विष्णु की प्रार्थना करनी चाहिए। शाम को, आपको फिर से पूजा करनी चाहिए और विष्णु मंदिर जाकर पूजा और आरती में भाग लेना चाहिए। एकादशी के दिनों में सोना मना है, लेकिन आज की परिस्थितियों में यह सबके लिए संभव नहीं है, इसलिए यदि आप चाहें तो सो सकते हैं।
💥अगले दिन सुबह, यानी द्वादशी के दिन, फिर से भगवान विष्णु की पुष्प, तुलसी और फलों से आराधना करें और दीपक जलाएं; पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमाआचन करें। पूजा समाप्त होने के बाद, ब्राह्मणों को पवित्र (सात्विक) भोजन अर्पित करें और फिर स्वयं भोजन करें।
💥व्रत तोड़ने के बाद, अपनी क्षमता के अनुसार ब्राह्मणों को पानी का बर्तन, अनाज, कपड़े, छाता, पंखा, गाय, पान, पलंग, बैठने की चटाई और सोना दान करें। हालांकि, आज के समय में यह अनिवार्य नहीं है। लेकिन, अगर इस दिन कोई आपसे कुछ मांगने आए, तो उसे मना न करने का भरसक प्रयास करें। निर्जला एकादशी भगवान के प्रति आपकी भक्ति की परीक्षा लेती है।
कुछ श्रद्धालु एकादशी से एक दिन पहले पड़ने वाले दशमी के दिन केवल एक ही भोजन करना पसंद करते हैं।
एकादशी का व्रत शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए किया जाता है। व्रत के लिए शरीर पर अधिक भार नहीं डालना चाहिए। वृद्ध और बीमार व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और नई माताओं को निर्जला एकादशी का व्रत नहीं करना चाहिए। निर्जला एकादशी मनाने के अन्य तरीके भी हैं, जैसे जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दान करना।
💥महत्वपूर्ण तिथियां और समय (2026)व्रत की तिथि: गुरुवार, 25 जून 2026एकादशी तिथि का प्रारंभ: 24 जून 2026 (शाम 06:12 बजे)एकादशी तिथि की समाप्ति: 25 जून 2026 (रात 08:09 बजे)व्रत पारण (व्रत तोड़ने का समय): 26 जून 2026 (सुबह 05:25 बजे से 08:13 बजे के बीच)
🕉️ पूजा विधि और नियमनिर्जल उपवास: इस व्रत का नियम बहुत सख्त है। एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक बिना जल के रहना होता है। (स्वास्थ्य ठीक न होने पर जल और फल भी लिए जा सकते हैं)。
💥विष्णु पूजा: इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है。 उन्हें पीले फूल, फल और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं。
मंत्र जाप: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना बेहद शुभ माना जाता है。
💧 दान का महत्वनिर्जला एकादशी पर दान करने का विशेष महत्व है ज्येष्ठ की गर्मी में पानी से भरा घड़ा (मटका), छाता, पंखा और मौसमी फलों का दान करना अत्यधिक पुण्यकारी माना गया है。
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" नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम् "
🛟॥ श्री हरिः ॐ ॥☀️
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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹। 💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱🔥🔱🌿




