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आज का पञ्चाङ्ग

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

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*🎈दिनांक 06 जुलाई 2026*
*🎈 वार- सोमवार*
*🎈 मास -  आषाढ़ मास*
*🎈 पक्ष -  कृष्ण पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर    पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)-    रौद्र*
*🎈 अयन - उत्तरायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि    -     षष्ठी    13:46:33 pm 
*तत्पश्चात सप्तमी*
*🎈 नक्षत्र -         पूर्वभाद्रपदा    16:06:42* तक* तत्पश्चात् उत्तरभाद्रपदा*
*🎈योग    -     सौभाग्य    15:49:58* तक  , तत्पश्चात् शोभन*
*🎈करण-        वणिज    13:46:33* तक,
 तत्पश्चात् विष्टि भद्र*
*🎈राहुकाल -07:30am   से 09:14am (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
*🎈चन्द्र राशि    -  कुम्भ    *till 09:56:24
चन्द्र राशि       मीन    from 09:56:24*
*🎈सूर्य राशि-       मिथुन*
*🎈 सूर्योदय -   05:47:41*
*🎈 सूर्यास्त -        19:32:07* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
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*🎈दिशा शूल- पूर्व दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)*
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:24 ए एम से 05:05 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त*- 12:12 पी एम से 01:07 पी एम*
*🎈 अमृत काल-    07:49 ए एम से 09:29 ए एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:20 ए एम, जुलाई 07 से 01:00 ए एम, जुलाई 07*
*🎈रवि योग-    05:46 ए एम से 12:09 पी एम*04:07 पी एम से 05:46 ए एम, जुलाई 07

*🎈व्रत पर्व विवरण - विशेष - सप्तमी को नीम की पत्ती, फल या दातून मुंह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🎈विशेष:-  आषाढ़ मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💢सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💢मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के 💢स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💢सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    
🛟मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💢धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    
💢गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
🛟रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    
चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
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        🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
         *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
day




           🛟चोघडिया, रात्🛟*
night


 
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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹।। 🔶🔶🌹🌹 🌹
       ➡️ *।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।
    🌺🌷🏓।। नारायण की परम भक्ति का फल🎉

🛟शनि क्यों देखते हैं तीसरा, सातवाँ और दसवाँ भाव?शनि की विशेष दृष्टि – कर्म, समय और जीवन की कथा
शनि देव को सूर्यपुत्र और छायापुत्र दोनों कहा गया है। यही उनकी प्रकृति का सबसे गहरा रहस्य है। सूर्य आत्मा, प्रकाश, सत्य और चेतना का प्रतीक है, जबकि छाया उन कर्मों, सीमाओं, संघर्षों और जीवन के अनदेखे पक्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिनका सामना करने से मनुष्य अक्सर बचना चाहता है। शनि इन दोनों के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं। वे बताते हैं कि केवल प्रकाश को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं, अपनी छाया को पहचानना और उसे कर्म के द्वारा परिष्कृत करना ही वास्तविक उन्नति का मार्ग है। इसलिए शनि जीवन की कठोर वास्तविकताओं के माध्यम से आत्मविकास का अवसर प्रदान करते हैं।
शनि को कर्म, समय, न्याय, धैर्य, अनुशासन, श्रम और कर्मफल का कारक माना गया है। उनकी तीसरी, सातवीं और दसवीं विशेष दृष्टियाँ जीवन के उन क्षेत्रों पर पड़ती हैं जहाँ व्यक्ति के प्रयास, संबंध और कर्म समय की कसौटी पर परखे जाते हैं।
तृतीय भाव संचार, लेखन, दस्तावेज़, अनुबंध, छोटे भाई-बहन, साहस, कौशल, पराक्रम और छोटी यात्राओं का भाव है। शनि की विशेष दृष्टि इस भाव पर यह संकेत देती है कि विचारों में गंभीरता, वाणी में संयम और प्रयासों में निरंतरता ही स्थायी सफलता का आधार बनती है। बिना परिश्रम प्राप्त उपलब्धियाँ अधिक समय तक टिक नहीं पातीं।
सप्तम भाव विवाह, साझेदारी, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक व्यवहार का प्रतिनिधित्व करता है। शनि की दृष्टि यहाँ यह सिखाती है कि संबंध केवल आकर्षण से नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, विश्वास, धैर्य और समय के साथ निभाए गए कर्तव्यों से मजबूत बनते हैं। जो संबंध परीक्षा की घड़ी में टिकते हैं, वही स्थायी होते हैं।
दशम भाव कर्म, व्यवसाय, पद, प्रतिष्ठा, सम्मान, उपलब्धि और सामाजिक पहचान का भाव है। शनि स्वयं कर्म के कारक हैं, इसलिए उनकी विशेष दृष्टि दशम भाव पर होना अत्यंत अर्थपूर्ण माना गया है। यह दृष्टि बताती है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुरूप ही प्रतिष्ठा और फल प्राप्त होगा। शनि शीघ्र सफलता नहीं देते, बल्कि ऐसा सम्मान देते हैं जो अनुभव, उत्तरदायित्व और समय की परीक्षा के बाद प्राप्त होता है और लंबे समय तक बना रहता है।
शनि को प्रसन्न करने का सर्वोत्तम उपाय किसी विशेष वस्तु से अधिक अपने व्यवहार में दिखाई देता है। समय का सम्मान करना, वचन निभाना, श्रम से कभी पीछे न हटना, सत्यनिष्ठ रहना, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, बुज़ुर्गों, श्रमिकों और जरूरतमंदों का सम्मान करना, सादगी और अनुशासन को जीवन का हिस्सा बनाना तथा अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करना ही शनि की वास्तविक उपासना है।

💕"तद् यद् रुदितात् समभवन् तस्माद् रुद्राः "
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" नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम् "

         🛟॥ श्री हरिः ॐ ॥☀️

    
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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹।      💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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‼️अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
🙏हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱🌿
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