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पञ्चाङ्ग 23 अक्टूबर 2026

 *💥🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓💥*

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*🎈दिनांक  23 अक्टूबर 2026*
*🎈वार-    शुक्रवार*
*🎈मास - आश्विन मास*
*🎈पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈विक्रम संवत् - 2083*
*🎈संवत्सर     पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)-    रौद्र*
*🎈अयन - दक्षिणायन*
*🎈ऋतु - शरद*
*🎈तिथि-द्वादशी - 02:35 पी एम तक तत्पश्चात त्रयोदशी * 
*🎈नक्षत्र- पूर्व भाद्रपद - 09:03 पी एम तक तत्पश्चात उत्तरभाद्रपदा*
*🎈करण-    बालव - 02:35 पी एम तक तत्पश्चात् कोलव, तैतिल *
*🎈योग-    ध्रुव - 10:08 पी एम तक तत्पश्चात्,व्याघात*
*🎈राहुकाल- 10:54 ए एम से 12:19 पी एम (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)*
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*🎈सूर्योदय- 06:39. ए एम*
*🎈सूर्यास्त- 05:59. पी एम*
*🎈चंद्र राशि- कुंभ* - 03:03 पी एम तक तत्पश्चात् मीन*
*🎈सूर्य राशि- तुला*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
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*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
(किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)*
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*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:58 ए एम से 05:49 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त: 11:57 ए एम से 12:42 पी एम*
*🎈अमृत काल-    12:58 पी एम से 02:35 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त -11:54 पी एम से 12:45 ए एम, अक्टूबर 24*
*🎈 रवि योग- 09:03 पी एम से 06:40 ए एम, अक्टूबर 24

*🎈विशेष:- व्रतपर्व विवरण-  🏵️ ☀️
☀️☀️23 अक्टूबर 2026 द्वादशी व्रत 🏓🏓🏓

👁️"विष्णु भगवान की जय हो "🙏 🌹

💢.ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्म खंड: 27.29-34) के अनुसार, द्वादशी तिथि के दिन 'पूतिका' (पोई का साग) खाना वर्जित है।
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   👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
     🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
       *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
day



          🛟चोघडिया, रात्🛟*
night


 
★√*★√*★√*★√*★√*★
     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
   
  ➡️ 💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺
#🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
🌹|| ✨ 🌹// 🕉️ ✨ 🌺 🦚 🌼 
💢पद्मनाभ द्वादशी 23 अक्टूबर विशेष 
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पापांकुशा एकादशी के अलगे दिन द्वादशी तिथि को पद्मनाभ द्वादशी व्रत आता है। पद्मनाभ द्वादशी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाई जाती है। पद्मनाभ द्वादशी को भगवान विष्णु के अनंत पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करने का विधान है।

चातुर्मास में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं तथा उनकी इस विश्राम अवस्था को पद्मनाभ कहा जाता है। अतः इस तिथि को पद्मनाभ द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री हरि जागृतावस्था प्राप्त करने हेतु अंगडाई लेते है तथा पद्मासीन ब्रह्या जी ओंकार (ॐ) ध्वति उच्चारित करते हैं।

इस दिन भगवान श्री हरि के पद्मनाभ स्वरूप की चंदन एवं कमल से पूजन करने का विधान है। पद्मनाभ द्वादशी के विशेष पूजन से निर्धन भक्ति धनवान एवं नि:संतानों को संतान सुख के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पद्मनाभ द्वादशी के दिन कलश स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. पद्मनाभ द्वादशी श्री हरि का स्मरण और भजन कर कीर्तन करते रहना चाहिए. साथ ही आस्था के अनुसार गरीब लोगों को विशेष चीजें दान करनी चाहिए. इस एकादशी को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

पद्मनाभ द्वादशी का पौराणिक महत्व
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श्री विष्णु भगवान को नारायण, हरि के साथ अनेक अनंत नामों से पुकारा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में भगवान विष्णु के तीन प्रमुख स्वरूपों में से एक हैं। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। शिव जी को संहारक माना जाता है। भगवान विष्णु को सृष्टि का रक्षक कहा जाता है।

मूलतः त्रिदेव एक ही हैं। भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध का अवतार लिया और अब वे कल्कि का अवतार लेंगे। विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के अनंत नाम हैं, जिनमें से उन्हें पद्मनाभस्वामी भी कहा जाता है।

दक्षिण भारत में विशेष रूप से पद्मनाभस्वामी स्वरूप की पूजा की जाती है. भगवान विष्णु के पद्मनाभस्वामी में पद्म का अर्थ कमल होता है. नाभ का अर्थ नाभि और स्वामी का अर्थ भगवान और स्वामी होता है इसलिए उनका शाब्दिक अर्थ है कमल नाभि वाले भगवान. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग का ध्यान कर रहे थे. तभी उनकी नाभि से एक कमल का फूल खिल गया और उस कमल से भगवान ब्रह्मा का जन्म हुआ. इसी कारण भगवान विष्णु को पद्मनाभ कहा जाता है।

पद्मनाभ द्वादशी पूजा विधि
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पद्मनाभ द्वादशी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा के लिए समर्पित है. इस पावन तिथि पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने के लिए विशेष पूजा-अनुष्ठान किए जाते हैं. कमल को पवित्रता, ज्ञान और सुंदरता का प्रतीक माना जाता है. भगवान विष्णु इन सभी गुणों के स्वामी हैं. इसीलिए भगवान विष्णु को पद्मनाभ कहा जाता है.

पद्मनाभस्वामी नाम केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित भगवान विष्णु के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर से भी जुड़ा है। इस मंदिर में भगवान विष्णु शेषनाग पर लेटे हुए कमल के फूल पर विराजमान हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को डालती है। इस दिन भक्त भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

पद्मनाभ द्वादशी के लाभ
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हिंदू धर्म में पद्मनाभ द्वादशी का विशेष महत्व है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से कई लाभ मिलते हैं. पद्मनाभ द्वादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है. भगवान विष्णु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्रदान करते हैं. पद्मनाभ द्वादशी के दिन भगवान विष्णु का व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के पिछले जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं. इससे आत्मिक शुद्धि और मन की शांति मिलती है.

पद्मनाभ द्वादशी के दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. धार्मिक उद्देश्यों के अनुसार, पद्मनाभ द्वादशी के दिन विधिपूर्वक पूजा करने और नियमों का पालन करने से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है. इसके अलावा, पद्मनाभ द्वादशी के दिन दान-पुण्य करने से भी विशेष फल मिलता है. गरीबों और विद्वानों की मदद करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

पद्मनाभ द्वादशी पूजा विधि
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पद्मनाभ द्वादशी के पावन दिन भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए विधि-विधान से पूजा करना जरूरी है। पद्मनाभ द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। पूजा स्थल को साफ करके गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए। पूजा में एक चौकी या आसन पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करना चाहिए। भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र भी रखना चाहिए,

पूजा में भगवान विष्णु का पंचामृत से स्नान कराना चाहिए. भगवान विष्णु को वस्त्र, चंदन का तिलक, तुलसी की माला और पुष्प चढ़ाने चाहिए. तुलसी के पत्ते के साथ भोग अर्पण करना चाहिए. द्वादशी के दिन "ॐ नमो नारायणाय" मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी होता है. "विष्णु सहस्रनाम" का पाठ भी करना चाहिए.

भक्तिपूर्वक भगवान पद्मनाभ का दुग्धाभिषेक करें। तदुपरान्त नमस्ते पद्मनाभाय। मन्त्र से यथाशक्ति तिल, चावल, जौ एवं घृत द्वारा हवन एवं पूजन करें।

रात्रिकाल में जागरण करें तथा जागरण सम्पन्न होने पर पुनः पूजन करें। पूजनोपरान्त ब्राह्मण को दक्षिणा सहित एक पाव मधु, अर्थात् 250 ग्राम शहद दान करें। दान करते हुये निम्नोक्त मन्त्र का उच्चारण करते हुये प्रार्थना करें -

पद्मनाभ नमस्तुभ्यं सर्वलोकपितामह।
मधुदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रदः॥

भावार्थ - "हे समस्त लोकों के पितामह! हे पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। मेरे द्वारा किये गये इस मधुदान से प्रसन्न होकर आप मुझे समस्त प्रकार के सुख प्रदान करने की कृपा करें।"

 द्वादशी के दिन कई भक्त उपवास भी रखते हैं और इस दिन केवल फलाहार किया जाता है. अगले दिन यानी सूर्योदय के बाद त्रयोदशी तिथि को उपवास तोड़ा जाता है।
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🌺‼️जय श्री कृष्णा! 🦚🚩 🌺🙏
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💕*"तद् यद् रुदितात् समभवन् तस्माद् रुद्राः"*💥
  ✨*नव ग्रहणां अधीनस्थ जीवनम्*✨
           *🛟॥ श्री हरिः ॐ*॥☀️
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏     
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 *💥“*ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।*
          *बाकी सब क्षणभंगुर* है।”💥
       🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥
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*♥️~*यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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