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पञ्चाङ्ग 17 मई 2026

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis


*🎈दिनांक 17 मई 2026*
*🎈 वार-  रविवार*
*🎈 मास - अधिक ज्येष्ठ मास प्रारंभ*
*🎈 पक्ष - शुक्ल पक्ष*
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 संवत्सर    पराभव*
*🎈संवत्सर (उत्तर)-    रौद्र*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈तिथि    -    प्रथमा    21:40:20*
तत्पश्चात्* द्वितीया*
*🎈 नक्षत्र -     कृत्तिका    14:31:16*
 तक  तत्पश्चात्         रोहिणी*
*🎈योग    -     शोभन    06:14:32* तक तत्पश्चात्     अतिगंड*
*🎈करण    -     किन्स्तुघ्न    11:35:38* तक तत्पश्चात् बव*
*🎈राहुकाल -05:36pm से 07:16pm (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)
*🎈चन्द्र राशि-     वृषभ*
*🎈सूर्य राशि-       वृषभ    *
*🎈 सूर्योदय -   05:47:17*
*🎈 सूर्यास्त -        19:15:58* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:22 ए एम से 05:04 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:05 पी एम से 12:59 पी एम*
*🎈अमृत काल-    12:26 पी एम से 01:50 पी एम    *
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:10 ए एम, मई 18 से 12:52 ए एम, मई 18*
 *🎈 व्रत एवं पर्व विवरण अमावस्या व्रत शनि जयंती   आज होगा (मासिक व्रत )*
*🎈विशेष - अमावस्या के पवित्र अवसर पर सात्विकता बनाए रखने के लिए मांसाहार, शराब, प्याज, लहसुन और अन्य तामसिक भोजन का सेवन न करें। इस दिन शुद्धता का विशेष महत्व है, इसलिए घर में बना सादा और शुद्ध भोजन ही करें। इसके साथ ही, अंधेरे में न रहने और क्रोध/कलह से बचने की भी सलाह दी जाती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🎈विशेष:- अधिक जेष्ठ मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
kundli


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        🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
         *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
day




           🛟चोघडिया, रात्🛟*
night


 
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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

👣🕉️ 🌹🌹 🌹🌹।। 🔶🔶🌹🌹 🌹
  
🔱🌹🌸 🌹 💢💢कर्ज ( ऋण ) उधारी‼️

❤️एक गरीब ब्राह्मण रोज विष्णु सहस्त्रनाम पढ़ता था और उसके घर चमत्कार होने लगे 

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1. त्रिवेणी घाट का दरिद्र ब्राह्मण
प्रयागराज के त्रिवेणी घाट से 2 कोस दूर बसा था काशीपुर गाँव। वहीं रहता था शास्त्री केशव मिश्र। उम्र 35 साल, धोती फटी हुई, पैरों में टूटी चप्पल, पर माथे पर चंदन का त्रिपुंड और आँखों में अजीब सी शांति। केशव के पास न खेत था, न दुकान। पिता का छोड़ा हुआ एक टूटा-फूटा घर, दो गायें, और एक पुरानी ताड़पत्र की पोथी — विष्णु सहस्त्रनाम। 

पत्नी सारदा और दो बच्चे — 8 साल का माधव और 5 साल की गौरी। घर में अनाज के नाम पर अक्सर बस मुट्ठी भर चावल। केशव गाँव में पूजा-पाठ कराके जो 10-20 रुपये मिलते, उसी से चूल्हा जलता। कई बार तो बस गंगा जल और तुलसी दल पर ही दिन कट जाता। 

गाँव वाले कहते: "पंडित जी, इतना पढ़े-लिखे हो। शहर जाओ, कथा करो, पैसा कमाओ। यहाँ भूखे मर रहे हो।" 
केशव हँसकर कहते: "लक्ष्मी चंचल है बहन, पर नारायण अचल हैं। जो नारायण को पकड़ ले, उसे लक्ष्मी खुद ढूंढती आती है।"

उसका नियम अटल था। सुबह 4 बजे गंगा स्नान, फिर पीपल के नीचे बैठकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ। एक हजार नाम, एक भी दिन नागा नहीं। 12 साल से लगातार। बारिश हो, बुखार हो, घर में अन्न न हो — पाठ नहीं रुकता था।

2. पहला चमत्कार: टूटी हांडी में खीर
कहानी शुरू हुई माघ की कड़कड़ाती सर्दी में। तीन दिन से घर में एक दाना नहीं था। गौरी बुखार में तप रही थी। सारदा ने रोते हुए कहा: "स्वामी, बिटिया को आज दवा नहीं, कम से कम एक चम्मच दूध तो मिल जाए।" 

केशव के पास जवाब नहीं था। वह रोज की तरह पीपल के नीचे गए। शरीर कांप रहा था, पर होंठों पर वही शब्द: “विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः...” 

पाठ पूरा करके घर लौटे तो देखते हैं — आँगन में उनकी दोनों गायें खड़ी हैं। गायें तो 6 महीने से दूध नहीं देती थीं, सूख गई थीं। पर आज उनके थन भरे हुए थे। सारदा हैरान। उसने दूध दुहा — पूरा 5 सेर। 

चूल्हा जलाया। घर में न चावल था, न शक्कर। सारदा ने कहा: "भगवान का नाम लेकर टूटी हांडी ही चढ़ा देती हूँ।" उसने हांडी में बस गंगा जल डाला। 10 मिनट बाद ढक्कन खोला तो हांडी में केसरिया खीर भरी थी। मेवे, इलायची की खुशबू से घर महक उठा। 

गौरी ने दो चम्मच खाई और उसका बुखार उतर गया। बची हुई खीर से पूरा परिवार 3 दिन तक खाता रहा, पर हांडी खाली नहीं हुई। 

गाँव में बात फैली: "केशव पंडित के घर अन्नपूर्णा खुद खीर बना गई।"

3. दूसरा चमत्कार: सूखा कुआँ और सोने की मुहरें
जेठ का महीना। गाँव में अकाल। काशीपुर का 100 साल पुराना कुआँ भी सूख गया। लोग 5 कोस दूर से पानी लाते। केशव का घर सबसे नीचे था, पर उनके आँगन का छोटा सा कुआँ भी रेत उगल रहा था। 

एक दिन पाठ के बाद केशव ने कुएँ में झाँका और बोले: “अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः...” — विष्णु सहस्त्रनाम का 89वाँ श्लोक। 

तभी कुएँ के अंदर से "गुड़-गुड़" की आवाज आई। साफ, मीठा, ठंडा जल अपने आप ऊपर आने लगा। 10 मिनट में कुआँ लबालब। पानी इतना मीठा कि जैसे गंगाजल में शहद घुला हो। 

गाँव वाले बाल्टी लेकर दौड़े। जिसने भी पानी पिया, उसका पेट दर्द, बुखार, चर्म रोग ठीक हो गया। 

उसी रात केशव को सपना आया। एक चतुर्भुज रूप बोले: "केशव, तूने मुझे हजार नामों से पुकारा। अब मैं तुझे एक नाम दूँगा — अजातशत्रु। कल सुबह कुएँ की जगत हटाकर देखना।" 

सुबह केशव ने जगत हटाई। नीचे मिट्टी में दबी थी एक छोटी सी मटकी। खोली तो 108 सोने की मुहरें। हर मुहर पर "ॐ नमो नारायणाय" लिखा था। 

केशव ने एक मुहर भी नहीं रखी। सरपंच को बुलाकर कहा: "यह गाँव का पानी है, तो यह धन भी गाँव का। इससे स्कूल की छत और अस्पताल बनवाओ।" 

4. तीसरा चमत्कार: श्राद्ध में आए पितर
भाद्रपद का महीना। केशव के पिता का श्राद्ध था। घर में तिल रखने को भी पैसे नहीं। सारदा चिंतित थी: "बिना ब्राह्मण भोज के पितर कैसे तृप्त होंगे?" 

केशव बोले: "हमारे पास विष्णु सहस्त्रनाम है। वही सबसे बड़ा भोज है।" उसने आँगन लीपा। केले के पत्ते बिछाए। पत्तों पर बस तुलसी दल और गंगा जल रखा। खुद बैठकर पाठ करने लगा: “यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः...”

पाठ जब 900 नाम पर पहुँचा, तो हवा चली। आँगन में सुगंध फैल गई। केले के पत्तों पर देखते-देखते 56 भोग सज गए — मालपुआ, खीर, पूड़ी, कचौड़ी, 10 तरह की सब्जी। 

और पत्तों के सामने? वहाँ धुंधले साये बैठे थे। केशव ने पहचान लिया — उसके पिता, दादा, परदादा। सब तृप्त होकर भोजन कर रहे थे। सबसे आखिर में पिता की आवाज आई: "बेटा, तूने हमें वैकुंठ का भोजन करा दिया। अब तेरा घर कभी खाली नहीं रहेगा।"

उस दिन के बाद केशव के घर में अन्न का भंडार कभी खत्म नहीं हुआ। चावल की बोरियाँ अपने आप भर जातीं।

5. परीक्षा: लक्ष्मी जी खुद आईं
खबर फैली तो दूर-दूर से लोग आने लगे। कुछ दर्शन को, कुछ परीक्षा लेने को। 

कनखल से एक धनी सेठ आया। हीरे का हार लेकर बोला: "पंडित जी, 1 करोड़ का हार है। अगर आपके नारायण सच में हैं, तो यह हार मेरे हाथ से उड़कर विष्णु जी की मूर्ति के गले में चला जाए।" 

केशव ने हार छुआ तक नहीं। आँख बंद करके पाठ किया: “अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः...” 

तभी हवा का झोंका आया। सेठ के हाथ से हार उड़ा और घर के मंदिर में रखी शालिग्राम शिला के गले में जाकर पड़ गया। सेठ घुटनों पर गिर पड़ा। 

उसी रात केशव के सपने में एक स्त्री आईं। कमल पर बैठीं, हाथ में कमल, हीरे-मोतियों से लदीं। बोलीं: "मैं लक्ष्मी हूँ। नारायण ने मुझे भेजा है। माँग केशव, क्या चाहिए? धन, वैभव, राज?" 

केशव हाथ जोड़कर बोला: "माते, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस इतना वरदान दो कि जब तक मैं विष्णु सहस्त्रनाम पढूं, मेरे द्वार से कोई भूखा, दुखी न लौटे। मेरा घर नहीं, मेरा मन तुम्हारा मंदिर बन जाए।" 

लक्ष्मी जी मुस्कुराईं: "तथास्तु। तूने मुझे ही जीत लिया केशव। जहाँ नारायण का नाम है, वहाँ मैं दासी बनकर रहूँगी।"

सुबह उठा तो देखा — उसका टूटा घर अब संगमरमर का भवन बन गया था। पर केशव ने भवन के सिर्फ एक कमरे में रहना स्वीकार किया। बाकी पूरा घर "नारायण सेवा आश्रम" बना दिया — जहाँ रोज 500 लोग भोजन करते, बीमारों का इलाज होता, बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाती।

6. अंतिम चमत्कार: मृत्यु पर विजय
25 साल बीत गए। केशव अब 60 का हो गया। एक दिन यमदूत उसे लेने आए। बोले: "पंडित, आयु पूरी हुई। चलो।" 

केशव ने कहा: "अभी मेरे पाठ के 108 नाम बाकी हैं। क्या इतना समय मिलेगा?" यमदूत हँसे: "समय हमारा दास है।" 

केशव ने पाठ शुरू किया: “सर्वप्रहरणायुधो नं... सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति” — अंतिम नाम पर आते ही पूरा घर प्रकाश से भर गया। 

शंख, चक्र, गदा, पद्म के साथ स्वयं नारायण प्रकट हुए। यमदूत डरकर पीछे हट गए। विष्णु जी बोले: "जिस जिह्वा ने रोज मेरे हजार नाम लिए, उस पर यम का कोई जोर नहीं। केशव, तू देह से मुक्त है, पर इच्छा हो तो कुछ दिन और संसार में रहकर मेरा नाम फैला।" 

केशव ने वरदान माँगा: "प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस जहाँ-जहाँ आपका सहस्त्रनाम गाया जाए, वहाँ कोई दुख, दरिद्रता, बीमारी न रहे।" 

"एवमस्तु," कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। 

कहते हैं, केशव मिश्र 120 साल जिए। जिस दिन उन्होंने शरीर छोड़ा, उनके आश्रम के ऊपर आकाश से फूलों की वर्षा हुई। उनकी पोथी आज भी काशीपुर के नारायण मंदिर में रखी है। जो भी श्रद्धा से 1 बार पाठ करता है, उसके घर का सबसे बड़ा संकट टल जाता है।

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कहानी का सार
नाम में शक्ति है: भगवान का नाम सिर्फ शब्द नहीं, साक्षात ऊर्जा है। रोज प्रेम से लिया जाए तो पत्थर भी पिघल जाए।
नियत साफ हो: केशव ने चमत्कार के लिए पाठ नहीं किया, नारायण के प्रेम में किया। इसलिए लक्ष्मी दासी बनकर आईं।
जो बाँटता है, वही पाता है: केशव ने सोने की मुहरें, घर, भोजन — सब बाँट दिया। इसलिए उसका भंडार कभी खाली नहीं हुआ।

विष्णु सहस्त्रनाम सिर्फ स्तोत्र नहीं, वैकुंठ की सीढ़ी है। जो रोज एक बार भी पढ़े, उसके घर नारायण खुद चमत्कार बनकर उतरते हैं। 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹।      💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
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💥*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱
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