*🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*
*🎈दिनांक 10अप्रैल 2026*
*🎈 वार- शुक्रवार *
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈 मास - वैशाख मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष,*
*🎈तिथि- अष्टमी 23:14:56* तत्पश्चात्
नवमी*
*🎈 नक्षत्र - पूर्वाषाढा 11:26:58* तक तत्पश्चात् उत्तराषाढा *
*🎈योग - शिव 18:29:30*तक तत्पश्चात् सिद्ध*
*🎈करण - बालव 10:20:35* तक तत्पश्चात् कौलव होगा।
*🎈राहुकाल -11:11 pm से 12:37 pm hv(नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)
*🎈 चन्द्र राशि- धनु *till 18:02:58
*🎈चन्द्र राशि- मकर from 18:02:58*
*🎈सूर्य राशि - मीन*
*🎈 सूर्योदय - 06:17:31*
*🎈 सूर्यास्त - 18:55:35*
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- पश्चिम दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:46 ए एम से 05:31 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त- 12:11 पी एम से 01:02 पी एम*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:13 ए एम, अप्रैल 11 से 12:59 ए एम, अप्रैल 11*
*🎈 व्रत एवं पर्व विवरण- मासिक व्रत
*🎈विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातून मुंह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🎈विशेष:- वैशाख मास महात्म्य *
👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी 💥सेनाधिपति चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💥मन्त्री मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी धान्याधिपति बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💥सस्याधिपति गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी मेघाधिपति चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💥धनाधिपति गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी नीरसाधिपति गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
💥रसाधिपति शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी फलाधिपति चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
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🛟 नागौर, राजस्थान, (भारत)
मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟
*🛟चोघडिया, दिन का🛟*
🛟चोघडिया, रात्🛟*
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🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩
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💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺
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🔶🌹🌹भगवान शिव द्वारा भस्म (भस्मी) धारण करने के पीछे पौराणिक ग्रंथों में मुख्य रूप से दो कथाएं प्रचलित हैं, जो वैराग्य और सृष्टि के चक्र को दर्शाती हैं:
1. सती का वियोग और वैराग्य।
सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में देह त्याग दी थी, तब भगवान शिव अत्यंत दुखी होकर उनकी पार्थिव देह को लेकर तीनों लोकों में घूमने लगे थे। जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग काटकर उन्हें मुक्त किया, तो शिव के हाथों में केवल उनकी देह की भस्म शेष रह गई। अपने प्रेम और वियोग की स्मृति में उन्होंने उस भस्म को अपने शरीर पर मल लिया। यह उनके पूर्ण वैराग्य का प्रतीक माना जाता है।
2. दधीचि ऋषि और शिव का स्वरूप।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब शिव ने श्रृष्टि के संहारक का रूप लिया, तब उन्होंने जगत की नश्वरता को दर्शाने के लिए भस्म को अपना श्रृंगार बनाया। भस्म इस बात का प्रतीक है कि अंत में सब कुछ राख में मिल जाना है।
भस्म धारण करने का आध्यात्मिक महत्व।
नश्वरता का बोध: भस्म यह याद दिलाती है कि यह शरीर क्षणभंगुर है और अंततः मिट्टी (राख) में मिल जाएगा।
पवित्रता: जिस प्रकार अग्नि में तपकर हर वस्तु शुद्ध हो जाती है, उसी प्रकार भस्म को परम पवित्र माना गया है।
कामदेव पर विजय: शिव पुराण के अनुसार, जब शिव जी ने कामदेव को भस्म किया था, तो उन्होंने उस राख को अपने शरीर पर लगाया था, जो इंद्रियों पर विजय और वासना के अंत का संकेत है।
नाथ परंपरा और अघोर कापालिक में भी भस्म का विशेष महत्व है, जहाँ इसे 'विभूति' के रूप में स्वीकार किया जाता है, जो संसार के मोह-माया से मुक्ति का मार्ग दर्शाती है।
भगवान शिव और भस्म का संबंध केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे वैज्ञानिक और दार्शनिक कारण भी छिपे हैं। इसके बारे में कुछ और महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं:
1. भस्म और नाथ संप्रदाय का संबंध।
नाथ संप्रदाय में शिव को 'आदिनाथ' माना जाता है। यहाँ भस्म को 'झोली' या 'विभूति' कहा जाता है। सिद्धों और योगियों के लिए भस्म धारण करना उनके अहंकार के नष्ट होने और शिवत्व में विलीन होने का प्रतीक है। विशेष रूप से उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में होने वाली 'भस्म आरती' इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ ताजी भस्म से शिव का अभिषेक किया जाता है।
2. दार्शनिक आधार: "चिंता से चिता तक"
भस्म जगत का अंतिम सत्य है। जिस प्रकार सोने को अग्नि में तपाने पर उसकी अशुद्धियाँ निकल जाती हैं, वैसे ही आत्मा जब विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को जला देती है, तो जो शेष बचता है वह 'विभूति' है।
शिव का भस्म धारण करना यह संदेश देता है कि संसार की चकाचौंध के पीछे अंततः राख ही सत्य है।
3. वैज्ञानिक और स्वास्थ्य पक्ष।
प्राचीन ग्रंथों और आयुर्वेद में भस्म के लेपन के कुछ व्यावहारिक लाभ भी बताए गए हैं:
कीटाणुनाशक: भस्म शरीर के रोमछिद्रों को साफ रखती है और त्वचा को हानिकारक कीटाणुओं से बचाती है।
तापमान नियंत्रण: विभूति या भस्म शरीर के तापमान को संतुलित करने में सहायक होती है, जो विशेष रूप से योगियों के लिए कठिन मौसम में साधना करने में मददगार होती है।
ऊर्जा का संरक्षण: ऐसा माना जाता है कि शरीर पर भस्म लगाने से शरीर की प्राण ऊर्जा (Pranic Energy) का क्षय कम होता है।
4. भस्म के प्रकार।
शास्त्रों में भस्म के भी भेद बताए गए हैं:
श्रोत्र भस्म: वेदों के बताए गए यज्ञों से प्राप्त।
अग्निहोत्र भस्म: नित्य किए जाने वाले हवन से प्राप्त।
लौकिक भस्म: सामान्य अग्नि से बनी।
इनमें से शिव पूजा के लिए गोबर के उपलों (कंडे) की भस्म या यज्ञ की भस्म को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
5. त्रिपुंड का महत्व।
शिव भक्त अपने माथे पर भस्म की तीन रेखाएं बनाते हैं जिसे 'त्रिपुंड' कहा जाता है। ये तीन रेखाएं महादेव की तीन शक्तियों—इच्छा, ज्ञान और क्रिया—का प्रतिनिधित्व करती हैं।
"भस्म धारण करने वाला व्यक्ति यह संकल्प लेता है कि वह अपने भीतर की बुराइयों को जलाकर भस्म कर देगा और शिव के समान निर्मल बनेगा।"
भगवान शिव द्वारा भस्म धारण करने और उससे जुड़ी परंपराओं के कुछ और गहरे और रहस्यमयी पहलुओं को समझना आवश्यक है:
1. भस्म आरती: उज्जैन का विशेष महात्म्य
दुनिया भर में उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती सबसे प्रसिद्ध है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि शिव 'काल के भी काल' (महाकाल) हैं।
परंपरा: प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि यह आरती श्मशान की ताजी राख से होती थी, लेकिन वर्तमान में यह कपिला गाय के गोबर के कंडों, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर तैयार की गई भस्म से की जाती है।
दर्शन: इस आरती का मुख्य संदेश यही है कि मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शिव मृत्यु के स्वामी हैं और अंत में सब कुछ उन्हीं में विलीन होना है।
2. त्रिपुंड की तीन रेखाओं का रहस्य
भस्म से माथे पर लगाई जाने वाली तीन समानांतर रेखाओं को 'त्रिपुंड' कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार, इन तीन रेखाओं में ब्रह्मांड के कई त्रिकोण छिपे हैं:
तीन लोक: भूलोक, अंतरिक्ष और स्वर्ग।
तीन गुण: सत्व, रज और तम।
तीन देव: ब्रह्मा, विष्णु और महेश।
तीन शक्तियाँ: इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति।
3. भस्म और अघोर।
अघोरियों और नागा सन्यासियों के लिए भस्म केवल एक श्रृंगार नहीं, बल्कि उनका 'वस्त्र' है। वे इसे 'दिगंबर' (आकाश ही जिनका वस्त्र हो) होने की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं।
वे भस्म को शरीर पर मलकर यह दर्शाते हैं कि उन्होंने संसार के प्रति मोह को जला दिया है।
उनके लिए भस्म "अमृत" के समान है, जो उन्हें सांसारिक अशुद्धियों से दूर रखती है।
4. भस्म स्नान का आध्यात्मिक प्रभाव
शास्त्रों में 'भस्म स्नान' की चर्चा की गई है। जब कोई भक्त या साधु पूरे शरीर पर भस्म मलता है, तो उसे मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का कारक माना जाता है। इसे 'आग्नेय स्नान' भी कहते हैं।
जिस प्रकार जल शरीर की बाहरी अशुद्धि धोता है, उसी प्रकार भस्म आंतरिक विकारों को सोख लेने की क्षमता रखती है।
5. भगवान शिव को ही भस्म क्यों प्रिय है?
भगवान शिव 'लय' (Destruction) के देवता हैं। लय का अर्थ अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन है। भस्म उस परिवर्तन की अंतिम अवस्था है। लकड़ी जलती है तो कोयला बनती है, फिर राख। लेकिन राख को और अधिक नहीं जलाया जा सकता। राख 'अक्षय' है।
शिव भी अक्षय और शाश्वत हैं, इसलिए भस्म उन्हें सबसे अधिक प्रिय है।
क्या आप जानते हैं?
शिव पुराण के 'विद्येश्वर संहिता' में बताया गया है कि जो व्यक्ति शुद्ध भस्म से त्रिपुंड धारण करता है, उसे सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है।
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. 💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
💥।। शुभम् भवतु।।💥
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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
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*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)*
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।*
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ 🇪🇬🔱🔥🔱




