*दिगंबर जैन समाज के महान महापर्व का आगाज पर्युषण पर्व*
दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण महापर्व को पर्वों का राजा (पर्वाधिराज) कहा जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक चलने वाला यह दस दिवसीय पर्व आज से शुरू हो रहा है .
इस अवसर पर सामाज के नथमल जैन ने बताया कि
पर्व मनाने का मूल कारण किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्ति-विशेष की स्मृति में नहीं, बल्कि आत्मा के शाश्वत स्वभाव और आत्म-शुद्धि के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
मुनि संघ कमेटी के अध्यक्ष गोपाल बड़जात्या ने कहा कि दिगंबर मान्यता के अनुसार, प्रत्येक आत्मा मूलतः शुद्ध और अनंत गुणों से युक्त है। अज्ञानता और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) के प्रभाव से आत्मा पर कर्मों का मैल चढ़ जाता है, जिससे वह संसार में परिभ्रमण करती रहती है।
इस पर्युषण पर्व पर जैन समाज के महान उपाध्याय श्री विकसंत सागरजी मुनि महाराज का ससंघ धर्म नगरी नागौर में विशेष आशीर्वाद व प्रेरणा जैन समाज को मिल रही है जिससे नया आनंद व उत्साह का वातावरण बना है।उनके आशीर्वाद से खानपान और विचारों में परिवर्तन आकर पूरे समाज में जैन सिद्धांत 'जीवो और जीने दो' के प्रति एक विशेष उत्साह नजर आ रहा है।
आचार्य श्री विराग सागर जी व आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के शिष्य महान तपस्वी संत उपाध्याय मुनिश्री विकसंत सागरजी महाराज ने पर्युषणपर्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्षाकाल (चातुर्मास) का यह समय प्रकृति में स्थिरता और आत्म-निरीक्षण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। दशलक्षण पर्व मनाने का मुख्य प्रयोजन सांसारिक कोलाहल और भौतिक प्रपंचों से हटकर आत्मा के दस स्वाभाविक धर्मों—उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य—को अपने भीतर जाग्रत करना है। यह दस दिन कषायों के शमन, पुराने संचित कर्मों की निर्जरा और नवीन कर्मों के आस्रव को रोकने का संकल्प लेने के लिए निर्धारित हैं।
मुनि श्री ने बताया कि वर्तमान दौर में भागदौड़, मानसिक तनाव, अंधी प्रतिस्पर्धा और भौतिकता की होड़ के बीच दशलक्षण धर्म अत्यंत व्यावहारिक 'लाइफ मैनेजमेंट' (जीवन प्रबंधन) का कार्य करता है.
आज की जीवनशैली में क्रोध और तनाव सामान्य बात है। 'उत्तम क्षमा' और 'उत्तम मार्दव' व्यक्ति को सहनशीलता, क्षमा-भाव और अहंकार से मुक्ति सिखाकर मानसिक रोगों, अवसाद और सामाजिक विग्रहों से बचाते हैं.
'उत्तम आर्जव' (मन, वचन और कर्म में एकरूपता) आधुनिक कॉरपोरेट व व्यक्तिगत संबंधों में निष्कपटता और सत्यनिष्ठा सिखाता है, जिससे जीवन से पाखंड और अंतर्द्वंद्व समाप्त होता है।
बाजारवादी संस्कृति लगातार असंतोष और लालच पैदा करती है। 'उत्तम शौच' (संतोष) और 'उत्तम आकिंचन्य' (अपरिग्रह) व्यक्ति को समझाते हैं कि वस्तुएं सुख का साधन नहीं हैं; आवश्यकताएं जितनी सीमित होंगी, जीवन उतना ही चिंतामुक्त होगा।
'उत्तम संयम' और 'उत्तम तप' प्रकृति के प्रति करुणा, इंद्रिय निग्रह और संतुलित आहार-विहार को बढ़ावा देते हैं। यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधारता है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन (इकोलॉजिकल बैलेंस) के लिए भी आवश्यक है।
समाज के रमेश चंद्र जैन ने बताया कि दशलक्षण पर्व केवल दस दिनों तक मंदिरों में सीमित रहने वाली धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह अंतर्मुखी होकर स्वयं का ऑडिट करने की वार्षिक कार्यशाला है। जब व्यक्ति इन दस गुणों को अपने दैनिक आचरण में उतारता है, तो जीवन स्वाभाविक रूप से शांत, समतापूर्ण और भयमुक्त बन जाता है।

