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पञ्चाङ्ग 08अप्रैल 2026

 *🗓*आज का पञ्चाङ्ग*🗓*

jyotis


*🎈दिनांक 08अप्रैल 2026*
*🎈 वार-   बुधवार *
*🎈 विक्रम संवत् - 2083*
*🎈 अयन - दक्षिणायण*
*🎈 ऋतु - शिशिर*
*🎈 मास - वैशाख मास*
*🎈 पक्ष - कृष्ण पक्ष,*
*🎈तिथि-     षष्ठी    19:01:13* तत्पश्चात्
तिथि    सप्तमी*
*🎈 नक्षत्र -         मूल    32:47:37* तक तत्पश्चात्         मूल    *
*🎈योग    -     वरियान    17:09:24*तक तत्पश्चात् परिघ*
*🎈करण    -     वणिज    19:01:13* तक तत्पश्चात्  विष्टि भद्र होगा।
*🎈राहुकाल -12:37 am से 02:11 am (नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*हर जगह का अलग होगा
(राहुकाल वह समय होता है जिसमे किसी भी नये अथवा शुभ कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए।)

*🎈 चन्द्र राशि-     धनु    *
*🎈सूर्य राशि - मीन*
*🎈 सूर्योदय -   06:19:37*
*🎈 सूर्यास्त -        18:54:34* 
*(सूर्योदय एवं सूर्यास्त ,नागौर राजस्थान मानक समयानुसार)*
*🎈दिशा शूल- उत्तर दिशा में*
( किसी भी विशेष कार्य हेतु दिशा शूल वाली दिशा में जाने से बचना चाहिए, यद्यपि यदि उसी दिन जाकर उसी दिन लौटना हैं, अथवा व्यवसाय के दृष्टिकोण से प्रतिदिन जाना ही पड़ता है तो प्रभाव कम हो जाएगा, फिर इस पर विचार करने की आवश्यकता नही है, यदि  किसी कारण वश दिशा शूल में जाना ही पड़े तो सूर्योदय से पूर्व निकलना  श्रेयस्कर होता है, अन्यथा एक  दिन पूर्व प्रस्थान रखकर भी निकला जा सकता हैं।)
*🎈ब्रह्ममुहूर्त - 04:47 ए एम से 05:33 ए एम*
*🎈अभिजित मुहूर्त-  कोई नहीं*
*🎈 निशिता मुहूर्त - 12:14 ए एम, अप्रैल 09 से 12:59 ए एम, अप्रैल 09*
*🎈 अमृत काल-    01:38 ए एम, अप्रैल 09 से 03:25 ए एम, अप्रैल 09*
*🎈रवि योग-    पूरे दिन*
*🎈 व्रत एवं पर्व विवरण-  मासिक व्रत 
*🎈विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातून मुंह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🎈विशेष:- वैशाख मास महात्म्य *
 👉 जय माँ आदिशक्ति सच्चियाय 🪔 
🎉विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल🛟
💥राजा    गुरु👑 - शासन व्यवस्था के स्वामी    💥सेनाधिपति    चन्द्र⚔️ - रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक
💥मन्त्री    मंगल⚜️ - नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी    धान्याधिपति    बुध🌻 - रबी की फसलों के स्वामी
💥सस्याधिपति    गुरु🌾 - खरीफ की फसलों के स्वामी    मेघाधिपति    चन्द्र🌧 - मेघ एवं वर्षा के स्वामी
💥धनाधिपति    गुरु💰 - धन एवं कोष के स्वामी    नीरसाधिपति    गुरु🪙 - धातु, खनिज आदि के स्वामी
💥रसाधिपति    शनि🍯 - रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी    फलाधिपति    चन्द्र🍎 - फल-पुष्पादि के स्वामी
kundli


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       *🛟चोघडिया, दिन का🛟*
day


          नागौर, राजस्थान, (भारत)    
         मानक सूर्योदय के अनुसार।*🛟


       🛟चोघडिया, रात्🛟*
night

*🛟 
 
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     🚩*श्रीगणेशाय नमोनित्यं*🚩
    🚩*☀जय मां सच्चियाय* 🚩 
  #🌕 👉 👉🦚❤️💐 🌼🪔🏓🎊
         💕🛟प्रात: विशेष🕉️🌺

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🔶🌹हरिहर स्तोत्रम🌹
शेष भाग कल से आगे......
हे चन्द्रमौले हरिरूप शम्भो हे चक्रपाणे शिवरूप विष्णु।  हे कामशत्रो खलु कामतात् मां पाहि नित्यं भगवान्मस्ते ॥71॥ 

सकललोकपशोकविनाशिनौ परमरामत्यया प्रविकाशिनौ।  अघसमूहविदारनकारिणौ हरिहरौ भज मूढ़ भिदां त्यज ॥72॥  

हरिः साक्षाधरः प्रोक्तो हरः साक्षाधरः स्मॄतः।  उभयोरन्तरं नास्ति सत्यं सत्यं न संशयः ॥73॥  

यो हरौ च हरे साक्षादेकमूर्तौ द्विधा स्थिते।  भेदं करोति मूढ़ात्मा स याति नरकं ध्रुवम् 74॥  

यस्य बुद्धिर्हरौ चापि हरे भेदं च पश्यति।  स नराधमतां यतो रोगी भवति मानवः 75॥ 

 यो हरौ च हरे चापि भेदबुद्धिं करोत्यहो।  तस्मानमूढतमो लोके नान्यः कश्चन विद्यते ॥76॥  

मुक्तिमिच्छसि तेत्तार्हि भेदं त्यज हरौ हरे।  अन्यथा जन्मलक्षेषु मुक्तिः खलु सुदुर्लभा 77॥  
विष्णोः शिवस्य चाभेद्ज्ञानमुक्तिः प्रजापते।  इति सद्वेदवाक्यानां सिद्धांतः प्रतिपादितः ॥78॥ 

 विष्णुः शिवः शिवो विष्णुरिति ज्ञानं प्रशिष्यते।  एतज्ज्ञानयुतो ज्ञानी नान्यथा ज्ञानमिष्यते ॥79॥  

हरिर्हरो हरश्चपि हरिरस्ति भावयन्।  धर्मार्थकाममोक्षानामाधिकारी भवेन्नरः ॥80॥ 

हरिं हरं भिन्नरूपं भावयत्यधमो नरः।  स वर्णसक्रो नूनं विज्ञेयो भावितात्मभिः ॥81॥  

हरे शम्भो हरे विष्णु शम्भो हर हरे हर।  इति नित्यं रालं जन्तुर्जीवन्मुक्तो हि जायते ॥82॥  न हरिं च हरं चापि भेदबुद्ध्या विलोकयेत्।  यदिच्छेदात्मनः क्षेम बुद्धिकुशलो नरः ॥83॥  हरे हर दयालो मां पाहि पाहि कृपां कुरु।  इति संजपनादेव मुक्तिः प्राणौ प्रतिष्ठिता ॥84॥  हरिं हरं द्विधा भिन्नं वस्तुतस्त्वेकरूपकम्।  प्राणमामि सदा भक्त्या रक्षतं तव महेश्वरौ ॥85॥  इदं हरिहरस्तोत्रं सूक्तं परमदुर्लभम्।  धर्मार्थकाममोक्षाणां दायकं दिव्यमुत्तमम् ॥86॥  शिवकेशवयोरैक्यप्रतिपादकमिदितम्।  पथेयुः कृतिनः शान्ता दन्त मोक्षाभिलाषिनः ॥87॥  एतस्य पनात्सर्वः सिद्धयो वशगास्तथा।  देवयोर्विष्णुशिवयोर्भक्तिर्भवति भूतिदा ॥88॥  धर्मार्थी लभते धर्ममर्थार्थी चार्थमश्नुते।  कामार्थी लभते कामं मोक्षार्थी मोक्षमश्नुते ॥89॥  दुर्गमे घोरसङ्ग्रामे कान्ने वधबंधने।  करागारेऽस्य पथाज्जयते तत्क्षणं सुखी ॥90॥  वेदे यथा सामवेदो वेदान्तो दर्शने यथा।  स्मृतौ मनुस्मृतिर्यद्वत् वर्णेषु ब्राह्मणो यथा ॥91॥  

यथाऽऽश्रमेषु सन्न्यासो यथा देवेषु वासवः।  यथाऽश्वत्थः पादपेशु यथा गंगा नदीषु च ॥92॥  

पुराणेषु यथा श्रेष्ठं महाभारतमुच्यते।  यथा सर्वेषु लोकेषु वैकुण्ठः परमोत्तमः ॥93॥ यथा तीर्थेषु सर्वेषु प्रयागः श्रेष्ठ इरितः।  यथा पुरिषु सर्वासु वर वाराणसी माता ॥94॥  

यथा दानेषु सर्वेषु चन्नदानं महत्तमम्।  यथा सर्वेषु धर्मेषु छिनिंसा परम स्मृता ॥95॥  

यथा सर्वेषु सौख्येषु भोजनं प्राहुरुत्तमम्।  तथा स्तोत्रेषु सर्वेषु स्तोत्रमेतत्परत्परम् ॥96॥  

अन्यानि अर्थात स्तोत्राणि तानि सर्वाणि निश्चितम्।  अस्य स्तोत्रस्य नो यान्ति षोडशीमपि सत्कलाम् ॥97॥  

भूतप्रेतपिषाचाद्य बालवृद्धग्रहश्च ये।  ते सर्वे नाशमायन्ति स्तोत्रस्यास्य प्रभावतः ॥98॥  

यत्रास्य पथो भवति स्तोत्रस्य महतो ध्रुवम्।  तत्र साक्षात्सदा लक्ष्मीर्वस्त्येव न संशयः ॥यद्यः99॥  

अस्य स्तोत्रस्य पाठेन विश्वेषौ शिवकेशवौ।  सर्वानमनोर्थान्पुंसां पूरयेतां न संशयः ॥100॥  

पुण्यं पुण्यं महत्पुण्यं स्तोत्रमेतद्धि दुर्लभम्।  भो भो मुमुक्षवः सर्वे युयं पत्त सर्वदा ॥101॥ 



हिमाचल में कहा जाता है कि वहां के राजा सिद्ध सेन के पास एक तांत्रिक गुटिका थी, जिसे वे अपने मुख में रखते थे जिससे वे अदृश्य हो सकते थे। 
उनकी मृत्यु के पश्चात, उनकी साधना का अधिकांश प्रभाव इसी सिद्ध गणपति मंदिर के क्षेत्र में समाहित माना गया। 
यह विग्रह साधारण गणेश प्रतिमाओं से भिन्न है।
 गणपति तंत्र के अनुसार, इसके स्वरूप में छिपे शिवशक्ति का एकात्मक रूप, विग्रह के भाल पर त्रिनेत्र शिव स्वरूप, गले में नाग कुण्डलिनी शक्ति स्वरूप यह दर्शाता है कि यहाँ गणपति केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि मोक्षदाता और पूर्ण शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
तांत्रिक ग्रंथों में त्रिनेत्रधारी गणपति की साधना शत्रुओं के स्तंभन और कठिन कार्यों में विजय प्राप्त करने के लिए की जाती है। 
राजा सिद्ध सेन ने इसी उद्देश्य से इस प्रतिमा को अभिमंत्रित किया था ताकि मंडी राज्य की सुरक्षा अभेद्य रहे।
भारत में ऐसे मात्र चार विग्रह हैं। इनमें से अन्य विग्रहों का संबंध भी प्राचीन तांत्रिक केंद्रों से है। माना जाता है कि इन मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा के समय विशिष्ट धातुओं और अष्टगंध का प्रयोग किया गया था, जो आज भी वहां की ऊर्जा को जीवंत रखता है।
औषध शास्त्र और तांत्रिक सिद्धियां।
हिमाचल की औझाई परंपरा में इस मंदिर को आरोग्य पीठ भी माना जाता है। 
प्राचीन समय में स्थानीय तांत्रिक अपनी जड़ी बूटियों और रसायनों को सिद्ध करने के लिए इस मंदिर के प्रांगण में अनुष्ठान करते थे। 
माना जाता है कि सिद्ध गणपति की छत्रछाया में तैयार की गई औषधियां असाध्य रोगों को दूर करने की क्षमता रखती हैं।
 साधना मार्ग पर चलने वाले साधक यहाँ मौन व्रत रखकर जप करते हैं ताकि उन्हें वाक सिद्धि प्राप्त हो सके।
मंडी को छोटी काशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ ८१ मंदिर हैं, जो काशी की भांति ही शिव और शक्ति के केंद्रों के रूप में स्थापित हैं। 
सिद्ध गणपति इस आध्यात्मिक मानचित्र के द्वारपाल/क्षेत्रपाल रूप में देखे जाते हैं।
 उनके दर्शन के बिना मंडी की तांत्रिक यात्रा अधूरी मानी जाती है।
 
शेष भाग कल.......

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.     💥“ज्ञान ही सच्ची संपत्ति है।
      बाकी सब क्षणभंगुर है।”💥
     🌼 ।। जय श्री कृष्ण ।।🌼
       💥।। शुभम् भवतु।।💥

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🔱🇪🇬जय श्री महाकाल सरकार 🔱🇪🇬 मोर मुकुट बंशीवाले  सेठ की जय हो 🪷*
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*♥️~यह पंचांग नागौर (राजस्थान) सूर्योदय के अनुसार है।*
*अस्वीकरण(Disclaimer)पंचांग, धर्म, ज्योतिष, त्यौहार की जानकारी शास्त्रों से ली गई है।*
*हमारा उद्देश्य मात्र आपको  केवल जानकारी देना है। इस संदर्भ में हम किसी प्रकार का कोई दावा नहीं करते हैं।*
*राशि रत्न,वास्तु आदि विषयों पर प्रकाशित सामग्री केवल आपकी जानकारी के लिए हैं अतः संबंधित कोई भी कार्य या प्रयोग करने से पहले किसी अच्छी जानकारी वाले ज्योतिषी से संपर्क करे।
*♥️ रमल ज्योतिर्विद आचार्य दिनेश "प्रेमजी", नागौर (राज,)* 
*।।आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो।।* 
🕉️📿🔥🌞🚩🔱ॐ  🇪🇬🔱🔥🔱
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